गुरुवार की देर सुबह चली सुनवाई में गुवाहाटी हाई कोर्ट ने असम पुलिस द्वारा ट्रांसजेंडर अभ्यर्थियों के लिए की गई भर्ती प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए। मुख्य न्यायाधीश अशुतोष कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने टिप्पणी की कि राज्य अभी भी “सच्चे अर्थों में समावेशी” भर्ती प्रक्रिया चलाने के लिए तैयार नहीं दिख रहा है, भले ही एक सार्वजनिक विज्ञापन ने औपचारिक रूप से ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों को आवेदन का अवसर दिया हो।
पृष्ठभूमि
यह मामला ऑल असम ट्रांसजेंडर एसोसिएशन द्वारा दायर किया गया था, जिसने आरोप लगाया कि सब-इंस्पेक्टर और कांस्टेबल पदों के लिए जारी पुलिस विज्ञापन की संरचना ही भेदभावपूर्ण थी। मुख्य आपत्ति थी कि ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों को पुरुष उम्मीदवारों के साथ जोड़ दिया गया था, जबकि महिलाओं के लिए अलग सीटें निर्धारित थीं। याचिकाकर्ता का कहना था कि इससे महिला ट्रांसजेंडर अभ्यर्थियों को पुरुष उम्मीदवारों जैसी शारीरिक परीक्षाओं से गुजरना पड़ता - जिसे वे अनुचित और गलत समझ का परिणाम बताते हैं।
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दिलचस्प बात यह है कि भर्ती प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और एक भी ट्रांसजेंडर व्यक्ति ने आवेदन नहीं किया। लेकिन जैसा कि मुख्य न्यायाधीश ने कहा, आवेदन न आने को सहमति नहीं माना जा सकता; बल्कि यह दर्शाता है कि प्रक्रिया की खामियों ने ही लोगों को आवेदन करने से रोका।
अदालत की टिप्पणियाँ
पीठ ने काफी समय यह समझने में लगाया कि प्रक्रिया गलत कहाँ गई। “पीठ ने कहा, ‘यदि आप ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को ऐसी श्रेणी में रखते हैं जहाँ उनकी शारीरिक क्षमता व पहचान के अनुसार मूल्यांकन नहीं होता, तो आप उनसे समान भागीदारी की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?’” अदालत ने जोर दिया कि मामला केवल सीटों की गणना का नहीं बल्कि गरिमा और समान अवसर सुनिश्चित करने का है।
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सरकार की ओर से बताया गया कि 2022 में एक स्टेट लेवल ट्रांसजेंडर प्रोटेक्शन सेल बनाई गई है, और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को पहचान पत्र भी जारी किए जा रहे हैं ताकि वे विभिन्न सरकारी लाभ ले सकें। ट्रांसजेंडर समुदाय को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा वर्ग (SEBC) घोषित करने का प्रस्ताव भी कैबिनेट के अनुमोदन के लिए भेजा गया है।
अदालत ने इन कदमों को सकारात्मक बताते हुए कहा कि वास्तविक समावेशन के लिए भर्ती के स्पष्ट और व्यावहारिक नियम जरूरी हैं। मुख्य न्यायाधीश कुमार ने सुझाव दिया कि पुरुष ट्रांसजेंडर को पुरुषों की तरह और महिला ट्रांसजेंडर को महिलाओं की तरह शारीरिक परीक्षाओं से गुजरना चाहिए - ठीक वैसे ही जैसे बाइनरी अभ्यर्थियों को परखा जाता है। उन्होंने कहा कि यह तरीका ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) रूल्स, 2020 की भावना के अनुरूप है, जो सम्मान, कल्याण और गैर-भेदभाव पर जोर देता है।
पीठ ने यह भी कहा कि संविधानिक ढाँचा - विशेष रूप से NALSA (2014) और Navtej Johar (2018) - साफ शब्दों में कहता है कि लैंगिक पहचान व्यक्ति की गरिमा का मूल हिस्सा है। “पीठ ने टिप्पणी की, ‘मान्यता तो दे दी, लेकिन व्यावहारिक उपायों के बिना समावेशन केवल कागज पर ही रह जाएगा।’”
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निर्णय
सुनवाई के अंत में अदालत ने असम सरकार से विस्तृत कार्ययोजना पेश करने को कहा। विशेष रूप से अदालत ने जानना चाहा:
- क्या ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए शिक्षा और रोजगार में आरक्षण का प्रस्ताव कैबिनेट ने मंजूर किया है
- भविष्य की भर्ती प्रक्रिया में पुरुष तथा महिला ट्रांसजेंडर अभ्यर्थियों के लिए न्यायसंगत व्यवस्था कैसे बनाई जाएगी
- ट्रांसजेंडर समुदाय की वास्तविक और प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं
मामले की अगली सुनवाई 11 फरवरी 2026 को होगी, जहाँ राज्य को अपना रोडमैप प्रस्तुत करना होगा। इसके साथ ही पीठ ने कार्यवाही स्थगित कर दी।
Case Title: All Assam Transgender Association vs. State of Assam & Ors.
Case No.: PIL/6/2022
Case Type: Public Interest Litigation (PIL)
Decision Date: 27 November 2025