गुरुवार को एक शांत लेकिन तनावपूर्ण अदालत कक्ष में बंबई हाई कोर्ट ने एक दशक पुराने ट्रिब्यूनल के फैसले को पलटते हुए मुंबई के उस दंपति को मुआवज़ा देने का आदेश दिया, जिनके 17-साल-के बेटे की 2008 के गणेशोत्सव की भीड़ में लोकल ट्रेन से गिरकर मौत हो गई थी। मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति जितेंद्र जैन ने परिवार के लंबे संघर्ष के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रुख अपनाया और कहा कि “कानून उन परिस्थितियों से आंख नहीं मूंद सकता जो आसपास की सच्चाइयों से साफ-साफ दिखाई देती हैं।”
Background (पृष्ठभूमि)
यह मामला सितंबर 2008 का है, जब जाइदीप तांबे, जो जोगेश्वरी का एक बारहवीं कक्षा का छात्र था, अपने दोस्तों के साथ लालबागचा राजा के दर्शन के लिए निकला था। एल्फिंस्टन रोड और लोअर परेल स्टेशनों के बीच कहीं भीड़भाड़ वाली लोकल ट्रेन से वह गिर गया। उसके नाबालिग दोस्तों ने उसे तुरंत KEM अस्पताल पहुँचाया, जहाँ डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
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लेकिन जब उसके माता-पिता ने रेलवे अधिनियम के तहत मुआवज़े की मांग की, तो रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल ने 2016 में उनकी याचिका इस आधार पर खारिज कर दी कि जाइदीप “बोना फाइड पैसेंजर” नहीं था और रेलवे रिकॉर्ड में किसी “दुर्घटना” का उल्लेख नहीं है। परिवार ने अपील की और कहा कि उनके बेटे के पास टिकट था और घटना की सूचना न देना घबराए हुए किशोरों की स्वाभाविक भूल थी।
Court’s Observations (अदालत की टिप्पणियाँ)
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जैन ने बार-बार ट्रिब्यूनल की संकीर्ण व्याख्या पर सवाल उठाए। उन्होंने बताया कि पंचनामा, अस्पताल रिकॉर्ड, पुलिस बयान और जांच रिपोर्ट-सभी लगातार यह संकेत देते हैं कि मृत्यु ट्रेन से गिरने के कारण हुई।
“पीठ ने टिप्पणी की, ‘जब सत्रह-अठारह साल के लड़के अपने दोस्त को चलती ट्रेन से गिरते देखते हैं, तो उनकी पहली प्रवृत्ति उसे बचाने की होती है-न कि स्टेशन मास्टर के केबिन की ओर भागने की।’”
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कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि KEM अस्पताल में दर्ज प्रथम बयान-विशेषकर उसके मित्र विवेक टुकराल का बयान-घटना के कुछ ही घंटों के भीतर लिया गया था और इसे गंभीरता से स्वीकार किया जाना चाहिए। इन बयानों में बताया गया था कि सभी दोस्तों ने, जिनमें जाइदीप भी शामिल था, यात्रा का टिकट खरीदा था।
एक समय न्यायाधीश ने लगभग बातचीत की तरह टिप्पणी की कि छह साल बाद घटना का फिजिकल टिकट मांगना-वह भी जब जिरह में इसे चुनौती नहीं दी गई-“पूरी तरह अव्यावहारिक” है।
उन्होंने सभी पक्षों को याद दिलाया कि रेलवे अधिनियम एक “कल्याणकारी कानून” है, जिसका उद्देश्य पीड़ितों की सहायता करना है, न कि उन्हें प्रक्रिया के जाल में फँसाना। न्यायाधीश ने यह भी कहा कि जैसे आपराधिक मामलों में परिस्थितिजन्य साक्ष्य और मृत्युकालीन बयान बेहद महत्वपूर्ण होते हैं, वैसे ही यहाँ भी पहली उपलब्ध सूचना को महत्व मिलना चाहिए।
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एक भावनात्मक पंक्ति में कोर्ट ने कहा, “युवा बेटे की मृत्यु का दुख अवर्णनीय है… और माता-पिता मामूली राशि के लिए वर्षों तक मुकदमा केवल तभी लड़ते हैं जब उनका दावा वास्तविक होता है।”
अदालत ने पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट तथा कर्नाटक हाई कोर्ट के उन फैसलों का भी हवाला दिया जहाँ साथ चल रहे दोस्तों की गवाही को टिकट खरीद साबित करने के लिए स्वीकार किया गया था।
Court’s Decision (अदालत का फैसला)
ट्रिब्यूनल के 2016 के आदेश को रद्द करते हुए हाई कोर्ट ने माना कि मृत बालक वास्तव में बोना फाइड पैसेंजर था और उसकी मृत्यु रेलवे अधिनियम के तहत “अनटुवर्ड इंसिडेंट” यानी अप्रत्याशित दुर्घटना ही थी। अदालत ने माता-पिता को 4 लाख रुपये मुआवज़ा और दुर्घटना की तारीख से 6% वार्षिक ब्याज देने का आदेश दिया, जो अधिकतम सीमा 8 लाख रुपये के भीतर होगा। रेलवे प्रशासन को निर्देश दिया गया है कि आदेश की प्रति और बैंक विवरण प्राप्त होने के आठ सप्ताह के भीतर राशि स्थानांतरित की जाए।
Case Title: Dhondu Sakharam Tambe & Anr. vs. Union of India
Case No.: First Appeal No. 1668 of 2016
Case Type: Civil Appeal (Railway Accident Compensation)
Decision Date: 21 November 2025