मंगलवार को हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट की एक व्यस्त सुनवाई के दौरान कोर्टरूम की फिज़ा थोड़ी तनावपूर्ण दिख रही थी। जस्टिस अजय मोहन गोयल ने एक मौखिक आदेश सुनाते हुए निचली अदालत के उस फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें सोलन की एक महिला द्वारा उसके फ्लैट की मॉर्गेज को लेकर किए गए धोखाधड़ी के आरोपों पर दायर सिविल सूट को आगे बढ़ने की अनुमति दी गई थी। बैंक इस मामले को शुरू में ही खारिज करवाना चाहता था, लेकिन हाई कोर्ट ने इसे उचित नहीं माना।
पृष्ठभूमि
यह विवाद सोलन के सपूरण स्थित हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी में स्थित ग्राउंड फ्लोर के एक साधारण से दिखने वाले फ्लैट से जुड़ा है। वादी, श्रीमती मंजना वर्मा सहनी का कहना है कि उन्होंने यह फ्लैट दिसंबर 2019 में मनजीत सिंह से खरीदा था। उनके अनुसार कागज़ात बिल्कुल सामान्य थे और पहले ही हिमुडा की आवश्यक अनुमतियां ली जा चुकी थीं।
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परेशानी तब शुरू हुई जब यूको बैंक और उसका सहयोगी संस्था इस फ्लैट का कब्ज़ा लेने की प्रक्रिया शुरू करने लगे, यह कहते हुए कि पहले अमनदीप सिंह नामक व्यक्ति ने इस पर मॉर्गेज बनाया था। वादी का कहना है कि उनका उससे कोई संबंध नहीं है। सोलन के सिविल जज के सामने दायर अपने वाद में उन्होंने बैंक अधिकारियों और अमनदीप सिंह पर “धोखाधड़ी करने” और “झूठे तथा मनगढ़ंत” दस्तावेज़ों का सहारा लेने का आरोप लगाया है।
बैंक ने जवाब में सीपीसी के ऑर्डर 7 रूल 11 के तहत एक आवेदन दायर किया, जिसका सीधा उद्देश्य यह था कि वादी का दावा शुरू में ही खारिज कर दिया जाए। उनका तर्क था कि मॉर्गेज की वसूली से जुड़ी बातें SARFAESI Act (2002) के दायरे में आती हैं, और यह कानून सिविल अदालतों को ऐसे मामलों में दखल की अनुमति नहीं देता। ट्रायल कोर्ट ने यह आवेदन खारिज कर दिया, जिसके बाद बैंक हाई कोर्ट पहुँचा।
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कोर्ट के अवलोकन
जस्टिस गोयल ने दोनों पक्षों की दलीलें ध्यान से सुनीं। यूको बैंक ने जोर देकर कहा कि SARFAESI Act की धाराएँ 34 और 35 स्पष्ट रूप से सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को रोकती हैं। बैंक का कहना था कि वादी को धारा 17 के तहत डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल में जाना चाहिए था।
लेकिन वादी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि यह सिर्फ मॉर्गेज रिकवरी का मामला नहीं है। इसमें गंभीर धोखाधड़ी के आरोप और वह घोषणा शामिल है जिसमें वादी ने गिफ्ट डीड और मॉर्गेज डीड को शुरू से ही अमान्य घोषित करने की मांग की है। ऐसे मुद्दे, उन्होंने कहा, सिर्फ सिविल कोर्ट ही तय कर सकता है।
जज भी इस तर्क से सहमत दिखे। सुनवाई के दौरान उन्होंने एक मौके पर लगभग सामान्य लहज़े में कहा-“वादी बैंक के लोन ट्रांज़ैक्शन से एकदम अजनबी है। ट्रिब्यूनल उसके मूल स्वामित्व के दावे को कैसे तय कर सकता है?”
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आदेश में जस्टिस गोयल noted कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि सिविल अदालतों के अधिकार क्षेत्र पर रोक को सख्ती से ही पढ़ा जाना चाहिए। “बेंच ने कहा, ‘वाद को शुरुआती चरण में ही फेंक देना बहुत खतरनाक कदम होगा, खासकर जब स्वामित्व और धोखाधड़ी जैसे मुद्दे उठाए गए हों।’” उन्होंने यह भी कहा कि गिफ्ट डीड और सेल डीड की वैधता जैसा मुद्दा डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल के अधिकार में नहीं आता।
कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि सूट को ट्रायल तक जाने देने का मतलब यह नहीं कि वादी के कथन को सच मान लिया गया है। बैंक को हर आरोप से मुकाबला करने का पूरा अवसर मिलेगा।
निर्णय
चूंकि मामला स्वामित्व, फर्जी दस्तावेज़ों और कथित धोखाधड़ी जैसे जटिल सवालों से जुड़ा था-जो SARFAESI Act की प्रक्रिया के दायरे से बाहर हैं-हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा वाद खारिज करने से इनकार करने के आदेश को सही माना।
इस प्रकार, यूको बैंक द्वारा दायर याचिका खारिज की जाती है, और अब यह सिविल सूट सोलन की अदालत में आगे बढ़ेगा।
Case Title: UCO Bank and Another vs. Smt. Manjana Verma Sahni and Another
Case No.: CMPMO No. 294 of 2022
Case Type: Civil Miscellaneous Petition (Order VII Rule 11 CPC challenge)
Originating Case: Civil Suit No. 19/2020 (Trial Court, Solan)
Decision Date: 11 November 2025