मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने गुरुवार को AMRUT 2.0 योजना के तहत बड़े जल-आपूर्ति प्रोजेक्ट को मंजूरी देने के खिलाफ दायर एक जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया। मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा और न्यायमूर्ति विनय सर्राफ की खंडपीठ के समक्ष हुई सुनवाई के दौरान कई बार माहौल गंभीर रहा, क्योंकि कोर्ट लगातार याचिकाकर्ता से उसकी आपत्तियों के आधार पर सवाल कर रही थी।
पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता महेश गर्ग, जो स्वयं को सामाजिक कार्यकर्ता बताते हैं, ने 2023 में नगर निगम और मेयर-इन-काउंसिल द्वारा पारित दो प्रस्तावों को चुनौती दी थी। इन प्रस्तावों में इंदौर की जल-आपूर्ति व्यवस्था के बड़े विस्तार के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट को मंजूरी दी गई थी। याचिकाकर्ता के अनुसार, 2011 में शुरू हुई AMRUT 1.0 योजना आज भी पूरी तरह लागू नहीं हुई है, और ऐसे में नई योजना शुरू करना “सरकारी खजाने पर अनावश्यक बोझ” होगा।
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उनके वकील का तर्क था कि “पुरानी योजना पूरी की जाए, फिर नई योजना शुरू हो,” और यह भी कहा कि पिछली देरी का असर पहले ही शहरवासियों पर पड़ा है। लेकिन राज्य सरकार इससे सहमत नहीं थी और उसने कहा कि पिछले दशक में इंदौर की आबादी और भौगोलिक विस्तार में भारी बदलाव आया है।
कोर्ट के अवलोकन
खंडपीठ ने AMRUT 2.0 के रिकॉर्ड को विस्तार से देखा। सुनवाई के दौरान एक समय मुख्य न्यायाधीश सचदेवा ने आगे झुककर कहा, “2011 में आबादी 19.64 लाख थी। आज यह लगभग 22 लाख है, और 29 नए गांव नगर निगम सीमा में आ चुके हैं।” अदालत ने यह भी नोट किया कि नगर क्षेत्र में 280 वर्ग किलोमीटर का विस्तार हुआ है और अनुमान है कि 2050 तक इंदौर की आबादी 82 लाख से ज्यादा हो सकती है।
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जल उपलब्धता को लेकर भी गंभीर चिंता जताई गई। अदालत ने दर्ज किया कि वर्तमान आपूर्ति 323 MLD है, जबकि शहर में 97.67 MLD की कमी है, जो आने वाले समय में और बढ़ेगी। AMRUT 2.0 इस क्षमता को बढ़ाकर 1650 MLD करने का लक्ष्य रखता है-एक बड़ा कदम, जिसका उद्देश्य भविष्य की जरूरतों को सुरक्षा देना है।
जब याचिकाकर्ता ने इस आधार पर नई योजना रोकने की मांग रखी कि पुरानी योजना अधूरी है, तब अदालत ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। खंडपीठ ने टिप्पणी की, “सिर्फ इसलिए कि पुरानी योजना अधूरी है, राज्य को आगे की योजना बनाने से नहीं रोका जा सकता। हम विशेषज्ञों से यह नहीं कह सकते कि वे सिर्फ इसलिए विकास रोक दें क्योंकि 2011 की योजना 100% पूरी नहीं हुई।”
न्यायाधीशों ने यह भी कहा कि AMRUT 1.0 बने 14 वर्ष हो चुके हैं। इस दौरान राज्य और नगर निगम को “व्यावहारिक अनुभव” मिला है, जिसने बड़े और नए ढांचे की आवश्यकता साबित की है।
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एक दिलचस्प क्षण तब आया जब याचिकाकर्ता के वकील ने भी स्वीकार किया कि इंदौर में जल-आपूर्ति पर्याप्त नहीं है। अदालत ने इस बात को दर्ज करते हुए कहा कि वित्तीय आपत्तियों के कारण तत्काल समाधान को रोका नहीं जा सकता।
निर्णय
अदालत ने कहा कि सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना राज्य की मूल जिम्मेदारी है और इसे टाला नहीं जा सकता। खंडपीठ ने स्पष्ट किया, “सरकारी खजाने पर भार पड़ना कोई वैध आधार नहीं है, जब योजना शहर को पर्याप्त पेयजल मुहैया कराने के लिए बनाई गई हो।” इसके साथ ही अदालत ने याचिका को आगे सुनने से इनकार करते हुए तुरंत खारिज कर दिया।
आदेश बेहद स्पष्ट रूप से समाप्त होता है-इंदौर की दीर्घकालिक जल सुरक्षा को प्रक्रियात्मक आपत्तियों से ऊपर रखा जाना चाहिए।
Case Title: Mahesh Garg vs. State of Madhya Pradesh & Others
Case No.: Writ Petition No. 38893 of 2025
Case Type: Public Interest Litigation (PIL)
Decision Date: 28 November 2025