जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय की जम्मू पीठ में एक लंबे समय से लंबित संपत्ति विवाद आखिरकार खत्म हो गया, जब न्यायमूर्ति संजय धर ने लगभग चार दशक पुराने मुकदमे की परतें हटाते हुए एक विस्तृत फैसला सुनाया। अदालत ने माना कि वादी दुर्गा देवी ने बहुत पहले ही अपने आचरण से वैधानिक पूर्व क्रयाधिकार (प्री-एम्पशन राइट) त्याग दिया था। इसी कारण ट्रायल कोर्ट द्वारा उसे दी गई कब्जे की डिक्री को पलट दिया गया।
पृष्ठभूमि
मामला पूंछ नगर के एक कच्चे मकान और उससे जुड़े खाली भूखंड से शुरू हुआ, जिसे 1976 में दुर्गा देवी और ईशर दास (अन्य पक्ष के पूर्वज) ने मिलकर खरीदा था। कई वर्ष बाद, ईशर दास ने 26 मई 1987 को अपनी हिस्सेदारी इक़बाल सिंह को बेच दी।
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दुर्गा देवी का दावा था कि उनके पास "पूर्व क्रयाधिकार" है-जो एक समय जम्मू-कश्मीर में लागू ‘राइट ऑफ प्रायर परचेज एक्ट’ के तहत मान्य था। साल 1986 में उन्होंने इस संबंध में नोटिस भी भेजा था।
लेकिन दिलचस्प बात यह है कि बिक्री की जानकारी मिलने के बाद उन्होंने जून 1987 में केवल निषेधाज्ञा (injunction) का मुकदमा दायर किया, न कि प्री-एम्पशन का। और इस मुकदमे में उन्होंने संपत्ति के बंटवारे की बात स्वीकार भी कर ली-जिसे उन्होंने बाद की कार्यवाही में नकार दिया। यह पहला मुकदमा बाद में छोड़ दिया गया और अनुपालन न होने पर खारिज हो गया।
इसके बाद मई 1988 में, एक साल की समयसीमा पूरी होने से ठीक पहले, उन्होंने नया मुकदमा दायर किया-इस बार खास तौर पर प्री-एम्पशन के लिए। ट्रायल कोर्ट ने 2001 में यह कहते हुए डिक्री दे दी कि संपत्ति एक इकाई है और उनका पूर्व क्रयाधिकार मान्य है।
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अदालत के अवलोकन
न्यायमूर्ति धर का निर्णय प्री-एम्पशन के सिद्धांत की गहराई में जाता है। उन्होंने इसे “एक बहुत कमजोर अधिकार” बताया और सर्वोच्च न्यायालय के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अदालतें आमतौर पर ऐसे दावों को “थोड़े संकोच या अरुचि” से देखती हैं क्योंकि वे किसी मालिक की अपनी पसंद के खरीदार को संपत्ति बेचने की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करते हैं।
न्यायालय के लिए सबसे निर्णायक तत्व वादी का पूर्व आचरण रहा। कई ऐसे बिंदु थे जिन्होंने बाद में किए गए दावों को कमजोर कर दिया:
- उन्होंने पहले नोटिस भेजा, लेकिन मुकदमा केवल निषेधाज्ञा के लिए दायर किया-प्री-एम्पशन के लिए नहीं।
- पहले मुकदमे में उन्होंने संपत्ति के बंटवारे की बात स्वीकार की।
- उन्होंने मुकदमे को छोड़ दिया, जिससे उनकी मंशा संदिग्ध लगने लगी।
- खरीदार द्वारा मकान के हिस्से को गिराए जाने के दौरान भी वह चुप रहीं।
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न्यायाधीश ने लिखा कि “वादिनी के इस आचरण ने प्रतिवादी को यह विश्वास करने की स्थिति में रखा कि उसने अपने प्री-एम्पशन अधिकार को त्याग दिया है।”
अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि बिक्री को 38 वर्ष बीत चुके हैं। न्यायमूर्ति धर के अनुसार, अब खरीदार को हटाना और 1987 की बिक्री कीमत (₹40,000) पर संपत्ति वापस लेना “गंभीर रूप से अनुचित” होगा।
इसके साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि 2019 के जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के बाद पूरे राइट ऑफ प्रायर परचेज एक्ट को ही खत्म कर दिया गया है-जो इस तरह के अधिकारों से दूर जाने की कानूनी सोच को दर्शाता है।
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निर्णय
अंततः उच्च न्यायालय ने इक़बाल सिंह की अपील स्वीकार कर ली और 2001 में दी गई ट्रायल कोर्ट की डिक्री को रद्द कर दिया। वादी द्वारा जमा किए गए ₹40,000 की राशि वापस करने का आदेश दिया गया और इस पुरानी कानूनी लड़ाई को औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया गया। अदालत ने ट्रायल कोर्ट का रिकॉर्ड भी लौटाने का निर्देश दिया।
Case Title: Iqbal Singh vs. Durga Devi & Others
Case No.: CFA No. 19/2001
Case Type: Civil First Appeal (Right of Prior Purchase / Pre-emption)
Decision Date: 21 November 2025