मदुरै, 25 नवंबर - मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने सोमवार को एक अहम आदेश पारित करते हुए तमिलनाडु सरकार को उन सात शिकायतकर्ताओं को मुआवज़ा देने का निर्देश दिया, जिनकी चोरी संबंधी FIR वर्षों बाद भी अनसुलझी रह गई। न्यायमूर्ति बी. पुगालेंधी ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि जांच कहीं अटक गई, राज्य अपनी ज़िम्मेदारी से हाथ नहीं झटक सकता।
ये याचिकाएँ सिवगंगई, मदुरै, रामनाथपुरम, करूर और पुडुकोट्टई के घरों में सेंधमारी और चोरी से जुड़ी थीं - कुछ 2015 से लंबित - जिन्हें पुलिस ने अनडिटेक्टेड बताकर बंद कर दिया था, जबकि पीड़ित लगातार पीछा करते रहे।
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पृष्ठभूमि
ज्यादातर याचिकाकर्ता सामान्य नागरिक थे - एक सेवानिवृत्त अधिकारी, ड्यूटी पर तैनात सैनिक का परिवार, अस्पताल में बेटे की देखभाल कर रहे माता-पिता और पारिवारिक समारोह के लिए घर से बाहर गई महिला। सभी लौटे तो पाया कि ताले टूटे हुए थे और सोना, नकदी या कीमती सामान गायब था।
फिर भी, पुलिस जांच या तो ठप हो गई या ऐसे निष्कर्ष पर पहुँची जिसमें किसी आरोपी की पहचान नहीं हो पाई। कुछ याचिकाकर्ताओं ने तो यह तक कहा कि CCTV फुटेज, फोरेंसिक सुराग और वरिष्ठ अधिकारियों की ओर से भेजे गए निर्देशों की भी अनदेखी हुई। कुछ को तो FIR बंद करने की सूचना भी नहीं दी गई।
कोर्ट के बाहर एक वकील ने धीमे स्वर में कहा, “यह सिर्फ चोरी हुए गहनों की बात नहीं है, विश्वास टूटने की भी बात है।”
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अदालत के अवलोकन
न्यायमूर्ति पुगालेंधी ने साफ टिप्पणी की कि अनडिटेक्टेड रिपोर्ट दाखिल करने से राज्य की संवैधानिक जवाबदेही खत्म नहीं होती। अदालत ने कहा, “जब राज्य अपराधों की जांच का विशेष अधिकार अपने पास रखता है, तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि पीड़ित बिना उपाय के न छोड़ दिए जाएँ।”
अदालत ने ढीली जांच पद्धति पर भी आपत्ति जताई - गवाहों से देर से पूछताछ, फोरेंसिक प्रक्रियाओं का कमजोर उपयोग, तकनीकी साधनों की अनदेखी और उच्चाधिकारियों के मेमो को नज़रअंदाज़ करना। अदालत ने कहा, “इसे अलग-थलग अक्षमता कहकर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।”
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पीड़ितों की मानसिक स्थिति पर भी टिप्पणी की - “उनकी चोरी हुई संपत्ति सिर्फ आर्थिक क्षति नहीं, बल्कि असहायता के गहरे भाव का प्रतीक है।”
कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि अनडिटेक्टेड रिपोर्ट स्थायी नहीं होती - कानूनी रूप से जांच जारी मानी जाती है और समय-समय पर समीक्षा आवश्यक है। अदालत ने पुलिस विभाग की हाल की सिफारिशों की सराहना की, लेकिन कहा कि जवाबदेही व्यवहार में दिखनी चाहिए।
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फैसला
प्रणालीगत सुधारों को अनिवार्य बताते हुए अदालत ने राज्य गृह विभाग को निर्देश दिया कि चोरी गई संपत्ति के मूल्य का 30% मुआवज़े के रूप में प्रत्येक याचिकाकर्ता को 12 सप्ताह के भीतर दिया जाए। यदि भविष्य में आरोपी पकड़े जाते हैं और संपत्ति बरामद होती है, तो यह राशि वापस वसूल की जा सकती है।
साथ ही, डीजीपी को निर्देशित किया गया कि—
- अनडिटेक्टेड रिपोर्ट दाखिल करने से पहले शिकायतकर्ता को सूचित किया जाए
- अनडिटेक्टेड केस रजिस्टर का नियमित विश्लेषण किया जाए
- साप्ताहिक क्राइम रिव्यू शीट्स का प्रभावी उपयोग हो
- स्पष्ट परिपत्र जारी किया जाए कि अनडिटेक्टेड केस बंद नहीं माने जाते
- जांच अधिकारियों के लिए प्रशिक्षण व रिफ्रेशर कोर्स कराए जाएँ
अदालत ने यह सुझाव भी दिया कि ज़िलों में ऐसे पुराने अनसुलझे मामलों की फिर से जांच के लिए विशेष विशेषज्ञ टीम गठित की जा सकती है।
इन निर्देशों के साथ सभी सात याचिकाएँ निपटा दी गईं - पीड़ितों को कम से कम आंशिक राहत मिली, भले ही पूरा न्याय अभी बाकी हो।
Case Title: Vallikannu v The District Superintendent of Police
Counsel for Petitioner: Mr. S. Vashik Ali, Mr. D. S. Haroon Rasheed, Mr. V. S. Kumara Guru, Mr. S. Gokulraj, Mr. Niranjan S. Kumar, Mr. J. Anandkumar, Mr. S. Mahendrapathy,
Counsel for Respondent: Mr. T. Senthil Kumar Additional Public Prosecutor
Case No: Crl.O.P.(MD)Nos.10290, 10329, 10659, 11358, 12469, 12555 & 13002 of 2025