जबलपुर स्थित मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में 14 नवंबर 2025 को एक भावनात्मक और तनावपूर्ण सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति विषाल धगत और न्यायमूर्ति बी.पी. शर्मा की खंडपीठ ने पार्वती सूर्यवंशी और ओमप्रकाश सूर्यवंशी के बीच लंबे समय से चल रही वैवाहिक लड़ाई पर अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने रिकॉर्ड, दलीलों और वर्षों की तल्खी का अध्ययन करने के बाद निष्कर्ष निकाला कि यह रिश्ता अब किसी भी तरह सुधरने की स्थिति में नहीं है। इसे “पूरी तरह टूट चुका विवाह” बताते हुए अदालत ने इसे समाप्त कर दिया।
पृष्ठभूमि
दोनों ने 2002 में शादी की थी और 2010 तक साथ रहे। इसके बाद घटनाक्रम कई परेशान शादीशुदा मामलों जैसा ही रहा-अलगाव, आपसी सहमति से तलाक का प्रयास, और समाज के दबाव में किया गया छोटा-सा समझौता। दोनों ने फिर साथ रहने की कोशिश की, लेकिन वह भी कुछ महीनों से ज़्यादा नहीं चला।
पार्वती ने दहेज मांग, मारपीट और प्रताड़ना के आरोप लगाए। दूसरी ओर, ओमप्रकाश का कहना था कि वह घर से पैसे और गहने लेकर चली गई थी और दोनों बेटियों के साथ भी सख्ती करती थी।
इन तनावपूर्ण परिस्थितियों के बीच 2018 में पार्वती ने दूसरी शादी कर ली-बिना पहले पति से कानूनी तलाक लिए। आर्य समाज में संपन्न यह विवाह ट्रायल कोर्ट के लिए बड़ा मुद्दा बन गया। ट्रायल कोर्ट ने इसी आधार पर उसके तलाक की याचिका खारिज कर दी, यह कहते हुए कि उसने “गलत आचरण” किया।
अदालत के अवलोकन
हाई कोर्ट ने इस मुद्दे को अधिक संवेदनशील और वास्तविक नजरिए से देखा। न्यायमूर्ति धगत ने स्पष्ट किया कि यहां प्रश्न यह नहीं है कि पार्वती की दूसरी शादी वैध है या नहीं, बल्कि यह कि क्या पहले विवाह में उसे क्रूरता झेलनी पड़ी।
बेंच ने कहा, “विवाह का पूरी तरह टूट जाना भी क्रूरता की श्रेणी में आता है।”
हालांकि हिंदू विवाह अधिनियम में यह अलग से सूचीबद्ध नहीं है, लेकिन अदालत ने कहा कि व्यावहारिक परिस्थितियों और वास्तविक जीवन की पीड़ा को अनदेखा नहीं किया जा सकता। अगर दो लोग लगभग दस साल से पति-पत्नी की तरह नहीं रह रहे, तो ज़बरदस्ती विवाह को खींचते रहना अनावश्यक प्रताड़ना है।
“पीठ ने कहा, ‘जब साथ रहने की कोई संभावना नहीं बचती, तो विवाह को जारी रखने का दबाव भी निरंतर क्रूरता बन जाता है।’”
दिलचस्प बात यह रही कि अदालत ने पार्वती की गलती भी स्वीकार की-वह बिना तलाक लिए दूसरी शादी कर चुकी थी। लेकिन अदालत ने यह भी माना कि इसका उपयोग ओमप्रकाश द्वारा उसे जीवन भर के लिए विवाह में फँसाए रखने के बहाने के रूप में नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी देखा कि पार्वती कोई भरण-पोषण नहीं चाहती और दोनों अपने-अपने जीवन पहले ही अलग बना चुके हैं।
निर्णय
अंततः हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलट दिया और हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत क्रूरता के आधार पर तलाक मंजूर किया-एक तरह की क्रूरता जिसे अदालत ने “जीवन की स्वतंत्रता न देने और तलाक का अनावश्यक विरोध करने” से उत्पन्न माना।
24 मई 2002 को संपन्न विवाह अब आधिकारिक रूप से समाप्त हो गया है।
अदालत ने एक और साफ निर्देश दिया: पार्वती को ओमप्रकाश से कोई गुजारा भत्ता या संपत्ति में अधिकार नहीं मिलेगा। इसके साथ ही, दोनों के बीच वर्षों से चली आ रही यह जटिल कहानी अदालत के निर्णय पर आकर खत्म हुई।
Case Title: Smt. Parvati Suryavanshi vs. Omprakash Suryavanshi
Case No.: First Appeal No. 789 of 2022
Case Type: Family Court Appeal (Divorce – Section 13(1)(ia) HMA)
Decision Date: 14 November 2025