पटना हाई कोर्ट के कोर्टरूम में 18 नवम्बर 2025 को एक ऐसा फैसला आया जिसने वहां मौजूद लोगों को थोड़ी देर के लिए चुप करा दिया। अदालत ने एक 17 वर्षीय बालक की जमानत खारिज करने वाले दो आदेशों को रद्द करते हुए कहा कि निचली अदालतों ने किशोर न्याय अधिनियम के “बच्चे के सर्वोत्तम हित” सिद्धांत को सही तरह नहीं समझा। न्यायमूर्ति अरुण कुमार झा ने दोनों पक्षों की दलीलों को लगभग एक घंटे सुनने के बाद यह फैसला सुनाया।
पृष्ठभूमि
यह मामला नवंबर 2024 से शुरू हुआ, जब हाजीपुर सदर पुलिस की एक टीम ने एक किशोर बाइक सवार को रोका, जो पुलिस को देखकर अचानक यू-टर्न लेकर भागने की कोशिश कर रहा था। सूचना देने वाले पुलिसकर्मी के लिखित बयान के अनुसार, युवक से देशी कट्टा, एक जिंदा कारतूस और बिना नंबर प्लेट की बाइक बरामद की गई। बाद में किशोर न्याय बोर्ड ने उसे “कानून के साथ संघर्ष में बच्चा” घोषित किया।
लेकिन उसकी जमानत याचिका पहले अप्रैल 2025 में जे.जे.बी. और फिर जून 2025 में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने खारिज कर दी। दोनों आदेश सोशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट पर आधारित थे, जिसमें कहा गया था कि लड़का “बुरी संगत” में है और संभवत: किसी गैंग के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। उसके पिता ने हालांकि यह भरोसा दिया था कि वह स्वयं बेटे की निगरानी करेंगे और उसे गलत संगति से दूर रखेंगे।
अदालत की टिप्पणियाँ
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति झा निचली अदालतों के निष्कर्षों से संतुष्ट नहीं दिखे। एक मौके पर उन्होंने थोड़ा तीखे लेकिन संयमित स्वर में कहा-“पीठ ने टिप्पणी की, ‘सिर्फ शक के आधार पर किसी बच्चे को कानून द्वारा दी गई सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता।’”
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अदालत ने पाया कि जमानत से इनकार करने का सबसे बड़ा आधार यह था कि रिहा होने पर बच्चा फिर बुरी संगत में लौट सकता है। पर न्यायालय ने साफ किया कि ऐसा मानने के लिए कोई ठोस सबूत रिकॉर्ड में नहीं था। उल्टा, यह भी सामने आया कि उसके खिलाफ अन्य मामलों में नाम उसी गिरफ्तारी के बाद जोड़ा गया-जिसे कोर्ट ने संदेह के साथ देखा।
न्यायमूर्ति झा ने किशोर न्याय अधिनियम की धारा 12 को पढ़ते हुए सरल शब्दों में समझाया कि नाबालिगों के लिए “जमानत नियम है, इनकार अपवाद।” उन्होंने कहा कि कानून तभी रोकता है जब रिहाई से बच्चे को किसी खतरे का सामना करना पड़े या न्याय प्रभावित हो।
आदेश में अधिनियम के मूल सिद्धांत-निर्दोष मानने का सिद्धांत, बच्चे के सर्वोत्तम हित, परिवार की पहली जिम्मेदारी और “नई शुरुआत”-को भी जोर देकर दोहराया गया। उन्होंने कहा कि ये सिद्धांत सिर्फ लिखे भर नहीं हैं; अदालतों को इन्हें लागू करना ही होता है।
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फैसला
अंत में, हाई कोर्ट ने पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए किशोर को ₹10,000 के जमानत बॉन्ड पर रिहा करने का आदेश दिया, जिसमें दो जमानतदार होंगे-एक उसका पिता। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि वह हर तारीख पर किशोर न्याय बोर्ड के सामने उपस्थित रहेगा। इसके साथ ही न्यायालय ने दोनों पूर्व आदेशों को रद्द करते हुए मामले को समाप्त किया।
Case Title: Banti Kumar @ Aryan Raj @ Hunter Yadav vs. State of Bihar & Anr.
Case Number: Criminal Revision No. 820 of 2025
Case Type: Criminal Revision (Bail matter concerning a Juvenile in Conflict with Law)
Decision Date: 18 November 2025