शुक्रवार को पटना हाईकोर्ट के शांत लेकिन तनातनी भरे माहौल में, जस्टिस पार्थ सारथी ने एक लंबे समय से चल रहे सेवा-विवाद में विस्तृत फैसला सुनाया। यह मामला, जो एक दशक से भी अधिक पुराना है, एक अहम सवाल पर टिक गया था: क्या एक आपराधिक मामला छुपाना सरकारी नौकरी खोने का आधार बन सकता है, भले ही बाद में व्यक्ति बरी हो जाए?
पृष्ठभूमि (Background)
याचिकाकर्ता उत्पल कांत प्रसाद वर्मा ने 2004 की भर्ती विज्ञापन के तहत कांस्टेबल पद के लिए आवेदन किया था। सब कुछ सामान्य चल रहा था, जब 2005 में उन पर एक एफआईआर-बिहटा थाना केस नंबर 301/2005-दर्ज हो गई, जिसमें मारपीट और अन्य आरोप शामिल थे। हालांकि 2009 में वह बरी हो गए, असली समस्या तब शुरू हुई जब उन्होंने 2007 में चरित्र सत्यापन प्रपत्र भरते समय लंबित आपराधिक मामला नहीं बताया।
सत्यापन के दौरान यह बात सामने आ गई। बीएमपी-14 के कमांडेंट ने 2007 में उन्हें बर्खास्त कर दिया, डीआईजी ने 2011 में इसे बरकरार रखा, और डीजीपी ने भी 2012 में उनकी याचिका खारिज कर दी। अंततः उन्होंने सेवा बहाली और सभी लाभों के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
अदालत की टिप्पणियाँ (Court’s Observations)
सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने विस्तार से दलीलें रखीं। याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि यह omission जानबूझकर नहीं था। उनके अनुसार, एफआईआर भर्ती आवेदन के बाद दर्ज हुई थी, इसलिए उम्मीदवार को लगा कि इसे बताने की आवश्यकता नहीं। उन्होंने ऐसे सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का सहारा भी लिया जिनमें “डर के कारण हुई चूक” पर नरमी दिखाई गई थी।
लेकिन राज्य ने कड़ा रुख अपनाया। उसके वकील ने तर्क दिया कि प्रपत्र भरते समय याचिकाकर्ता जानते थे कि मामला लंबित है, फिर भी उन्होंने इसे छिपाया। यह कार्रवाई बिहार पुलिस मैनुअल के नियम 673(c) के अनुरूप थी, जिसमें कहा गया है कि यदि उम्मीदवार द्वारा दिया गया चरित्र विवरण झूठा पाया जाए तो उसे हटाना अनिवार्य है।
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जस्टिस सारथी ने दोनों पक्षों की दलीलों और उद्धृत निर्णयों पर विचार किया, लेकिन स्पष्ट किया कि नियम स्वयं बहुत साफ है। एक महत्वपूर्ण अनुच्छेद में पीठ ने टिप्पणी की, “यदि व्यक्ति का चरित्र खराब रिपोर्ट हो या उसका बयान झूठा पाया जाए, तो उसे बल से हटा दिया जाएगा।”
न्यायालय ने आगे कहा कि याचिकाकर्ता का यह तर्क-कि उन्हें समझ नहीं आया कि कौन-सा मामला बताना है-चरित्र सत्यापन की बाध्यकारी प्रकृति के अनुरूप नहीं है। भले ही बाद में वह बरी हो गए हों, यहाँ मूल मुद्दा सत्यनिष्ठा का था, जो पुलिस भर्ती में बुनियादी माना जाता है।
एक स्थान पर अदालत ने टिप्पणी की, “आपराधिक मामले की लंबितता सामने आने पर ही बर्खास्तगी का आदेश पारित किया गया… अदालत को इसमें किसी प्रकार की अवैधता नहीं दिखती।”
फैसला (Decision)
रिकॉर्ड और लागू नियमों की समीक्षा के बाद, हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता ने महत्वपूर्ण तथ्य को वास्तव में छिपाया था, और अधिकारी पूरी तरह नियम 673(c) के ढांचे में कार्य कर रहे थे।
अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा उद्धृत सुप्रीम कोर्ट के फैसले इस मामले की परिस्थितियों पर लागू नहीं होते। अंततः, कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। इस तरह, 2013 से लंबित यह विवाद समाप्त हो गया।
Case Title: Utpal Kant Prasad Verma vs. State of Bihar & Others
Case No.: CWJC No. 20946 of 2013
Case Type: Civil Writ Jurisdiction (Service Matter – Dismissal for Suppression of Facts)
Decision Date: 21 November 2025