नई दिल्ली, 24 नवंबर - सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई संक्षिप्त लेकिन दिलचस्प सुनवाई एक छोटे से तकनीकी मुद्दे पर केंद्रित रही, जो देखने में मामूली लग सकता है, पर दिवालियापन मामलों के लिए उसका असर काफी बड़ा है। न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति आलोक अराध्य की पीठ ने यह जांची कि क्या IBC की धारा 7 के तहत दायर एक याचिका केवल इसलिए खारिज की जा सकती है क्योंकि उसका हलफनामा आवेदन से पहले शपथ लिया गया था।
अदालत का माहौल शांत था, पर दोनों पक्षों के वकील सतर्क दिख रहे थे - आखिर बात कॉर्पोरेट दिवालियापन, समयसीमा और प्रक्रिया अनुपालन की थी।
पृष्ठभूमि
मामला तब शुरू हुआ, जब HDFC बैंक ने अहमदाबाद स्थित नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) में Livein Aqua Solutions Private Limited के खिलाफ दिवालियापन कार्यवाही शुरू करने की याचिका दायर की। बैंक का दावा था कि कंपनी ने ₹5.5 करोड़ का बकाया भुगतान नहीं किया, जो 2019 में गैर-निष्पादित आस्ति (NPA) घोषित हो गया था।
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लेकिन जून 2024 में NCLT ने आवेदन यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उसे सपोर्ट करने वाला हलफनामा 17 जुलाई 2023 को बनाया गया था, जबकि आवेदन 26 जुलाई को सत्यापित किया गया था।
अगस्त 2025 में NCLAT ने इस आदेश को पलटते हुए कहा कि यह दोष सुधार योग्य है और याचिका बहाल की। इसके बाद कंपनी ने IBC की धारा 62 के तहत सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
अदालत की टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि प्रक्रिया संबंधी नियम न्याय में बाधा बनने के लिए नहीं हैं। न्यायमूर्ति कुमार ने कहा कि IBC के फॉर्म 1 या नियम 4(1) में कहीं भी यह अनिवार्य नहीं है कि धारा 7 के आवेदन के साथ हलफनामा होना जरूरी है, हालांकि NCLT नियम 34(4) के तहत इसकी मांग की गई है।
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लेकिन असली मुद्दा यह था कि क्या NCLT ने आवेदन खारिज करने से पहले कानूनन आवश्यक नोटिस दिया था। पीठ ने पाया कि ट्रिब्यूनल ने IBC की धारा 7(5)(b) के प्रावधान के तहत वह विशेष नोटिस जारी ही नहीं किया, जिसमें सात दिनों के भीतर त्रुटि सुधारने का अवसर देना अनिवार्य है।
पीठ ने टिप्पणी की, ‘दोषपूर्ण हलफनामा होने से पूरी याचिका समाप्त नहीं हो जाती, खासकर जब कानून उसे सुधारने की अनुमति देता है।’
न्यायालय ने यह भी कहा कि प्रक्रिया का उद्देश्य “न्याय को आगे बढ़ाना है, रोकना नहीं,” और पुराने फैसलों का हवाला देते हुए याद दिलाया कि तकनीकी त्रुटियों के कारण मुकदमे स्वतः समाप्त नहीं होने चाहिए।
एक चरण पर पीठ ने सख्त लहजे में कहा कि NCLT वेबसाइट पर डाली गई सामूहिक नोटिस पर्याप्त नहीं मानी जा सकती। न्यायमूर्ति कुमार ने कहा, “प्रावधान के अनुसार नोटिस सीधे आवेदक को दिया जाना चाहिए,” यानी प्रक्रिया का पालन सिर्फ औपचारिकता नहीं है।
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निर्णय
अंततः अदालत NCLAT की इस राय से सहमत रही कि आवेदन केवल हलफनामे की तारीख को लेकर खारिज नहीं किया जा सकता।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने एक सुधार किया - उसने NCLAT पर यह कहते हुए आपत्ति जताई कि याचिका बहाल करते समय हलफनामा दुरुस्त करने का निर्देश दिया जाना चाहिए था। अदालत ने HDFC बैंक को आदेश दिया कि वह सात दिनों के भीतर अपना दोषपूर्ण हलफनामा और अन्य दस्तावेज़ सुधारकर दाखिल करे। इसके बाद ही NCLT आवेदन पर मेरिट के आधार पर सुनवाई शुरू करेगा। आदेश में कहा गया, “अपील इसी के साथ निस्तारित की जाती है,” और दोनों पक्षों को अपने खर्च स्वयं वहन करने होंगे।
अब मामला दोबारा NCLT के पास जाएगा - इस बार प्रक्रिया को लेकर स्थिति कहीं अधिक स्पष्ट है।
Case Title: Livein Aqua Solutions Private Limited vs. HDFC Bank Limited
Case No.: Civil Appeal No. 11766 of 2025
Case Type: Civil Appeal under the Insolvency and Bankruptcy Code (IBC)
Decision Date: November 24, 2025