यूपी में मोटर व्हीकल्स एक्ट मामलों की समाप्ति पर सुप्रीम कोर्ट की गंभीर टिप्पणी, राज्य से विस्तृत स्पष्टीकरण की मांग

By Vivek G. • November 24, 2025

एस. राजसीकरन बनाम भारत संघ और अन्य, सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मोटर व्हीकल एक्ट मामलों की समाप्ति पर गंभीर सवाल उठाए, राज्य से विस्तृत कानूनी स्पष्टीकरण मांगा।

कोर्ट नंबर 8 के भीतर माहौल असामान्य रूप से तनावपूर्ण था। सुनवाई अपेक्षा से लंबी चली, और इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के उस फैसले पर तीखे सवाल उठाए जिसके तहत 31 दिसंबर 2021 तक लंबित हजारों मोटर व्हीकल एक्ट मामलों को स्वतः समाप्त कर दिया गया था। जस्टिस जे.बी. Pardiwala और जस्टिस के.वी. Viswanathan की पीठ ने बार-बार पूछा कि सड़क हादसों और बढ़ती मौतों से जूझ रहे देश में ऐसा व्यापक “abatement” क्यों और कैसे उचित ठहराया जा सकता है।

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पृष्ठभूमि

यह मुद्दा लंबे समय से चल रही जनहित याचिका S. Rajaseekaran v. Union of India के दौरान कई अंतरिम आवेदनों के जरिये सामने आया। आवेदकों ने बताया कि उत्तर प्रदेश Criminal Law (Composition of Offences and Abatement of Trials) Amendment Act, 2023 ने चुपचाप मोटर व्हीकल्स एक्ट के तहत चल रहे मुकदमों को खत्म कर दिया-यहां तक कि कई गैर-समझौता योग्य (non-compoundable) मामलों को भी।

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सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि शराब पीकर गाड़ी चलाना, खतरनाक ड्राइविंग, असुरक्षित वाहन चलाना जैसी गंभीर धाराएँ भी इस "one-stroke abatement" का हिस्सा बन गईं। एक आवेदक ने कोर्ट को बताया कि 1977 से 2021 तक 44 वर्षों में ऐसे पाँच अलग-अलग कानून पास किए जा चुके हैं, जिनसे ट्रैफिक मामले बार-बार समाप्त होते रहे।

कोर्ट की टिप्पणियाँ

जैसे ही दलीलें शुरू हुईं, पीठ ने अपनी चिंता स्पष्ट कर दी। जजों ने कहा कि गंभीर ट्रैफिक उल्लंघन करने वाले लोगों को केवल इसलिए छोड़ देना कि लंबित मामले खत्म करने हैं, कानून के उद्देश्य को ही खत्म कर देता है। जस्टिस Pardiwala ने कहा, “अगर कोई व्यक्ति सेक्शन 185-यानि शराब पीकर गाड़ी चलाने जैसे गैर-समझौता योग्य अपराध-में अभियुक्त है, तो राज्य कैसे कह सकता है कि मुकदमा अपने-आप खत्म हो गया?”

कोर्ट ने यह भी कहा कि देर होना मुकदमे खत्म करने का आधार नहीं बन सकता। एक जज ने कहा, “एक झटके में कार्यवाही समाप्त करना पूरा deterrence निकाल देता है। और ट्रैफिक अपराधों में deterrence कोई विकल्प नहीं है।”

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राज्य ने सफाई दी कि अगर हादसे में किसी को चोट या मौत हो जाए तो IPC की धाराएँ—जैसे 279 या 304A-लागू होंगी। लेकिन अदालत ने इसे स्वीकार नहीं किया। पीठ ने साफ कहा, “यह उदाहरण संशोधन को जायज़ नहीं ठहराता,” और यह भी कि MV Act की धाराएँ हटने से IPC की कार्यवाही भी कमजोर पड़ सकती है।

जजों ने कई बार बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं, अनुशासनहीन ट्रैफिक और तेज गति वाले वाहनों के खतरे पर चिंता जताई। “यह लंबित मामलों को हटाने का शॉर्टकट नहीं हो सकता,” अदालत का यह वाक्य खुलकर गूंजा।

निर्णय

सुनवाई के अंत में, सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को धारा-वार विस्तृत हलफनामे दाखिल करने का निर्देश दिया-यह बताते हुए कि हर श्रेणी के अपराध को समाप्त करना क्यों और कैसे उचित है, विशेषकर उन मामलों में जो गैर-समझौता योग्य हैं।

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पीठ ने कहा कि इसके परिणाम “बेहद गंभीर” हो सकते हैं। इसलिए कानूनी विभाग और परिवहन विभाग के सचिवों को छह सप्ताह के भीतर पूरा स्पष्टीकरण देना होगा। मामला अब 22 जनवरी 2026 को दोबारा सुना जाएगा, और कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसे ठोस, तर्कसंगत और कानूनी आधार वाला जवाब चाहिए-सामान्य आश्वासन नहीं।

Case Title: S. Rajaseekaran v. Union of India & Others

Case Number: W.P. (Civil) No. 295/2012

Case Type: Public Interest Litigation (PIL) – Road Safety & Motor Vehicles Act Issues

Decision / Hearing Date: 20 November 2025

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