सुप्रीम कोर्ट ने 2002 की चेन्नई संपत्ति नीलामी बहाल की, कहा-नोटिस के बाद भी चुप रहने वाले देनदार अब चुनौती नहीं दे सकते

By Vivek G. • November 25, 2025

जी.आर. सेल्वराज (मृत) बनाम के.जे. प्रकाश कुमार और अन्य, सुप्रीम कोर्ट ने 2002 की चेन्नई नीलामी बहाल की, कहा-देनदारों ने नोटिस के बाद आपत्ति नहीं उठाई, इसलिए अब बिक्री चुनौती नहीं दे सकते।

नई दिल्ली, 25 नवंबर - सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मद्रास हाई कोर्ट के 2009 के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें 2002 में चेन्नई में अदालत द्वारा कराई गई संपत्ति नीलामी को अमान्य ठहराया गया था। सुनवाई ज़्यादा लंबी नहीं चली, लेकिन पूरे समय अदालत में एक तरह का “अब बस, बहुत हो चुका” वाला भाव दिखाई दे रहा था। एक वकील ने आधी आवाज़ में कहा, “एक्ज़िक्यूशन केस मूल मुकदमे से ज़्यादा लंबा नहीं चलना चाहिए,” और Bench के कुछ सदस्य सहमति में सिर हिलाते नज़र आए।

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पृष्ठभूमि

मामला 1995 में शुरू हुआ, जब उधारदाता रशीदा यासीन ने कोमला अम्माल और उनके बेटे के.जे. प्रकाश कुमार के खिलाफ ₹2 लाख का कर्ज़ न चुकाने पर मुकदमा दायर किया। 1997 में मुकदमा डिक्री में बदल गया, और 1998 तक वसूली की प्रक्रिया शुरू होने तक रकम लगभग ₹5 लाख पहुँच गई।

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रकम की वसूली के लिए चेन्नई के चूलै इलाके में स्थित करीब 2,120 वर्गफुट का एक मकान कुर्क किया गया और आखिरकार 12 सितंबर 2002 को नीलाम हुआ। इस नीलामी में जी.आर. सेल्वराज़ ने ₹11.03 लाख में संपत्ति खरीदी और बाद में उन्हें बिक्री प्रमाणपत्र भी मिल गया। सेल्वराज़ के निधन के बाद उनके कानूनी वारिसों ने अपील को आगे बढ़ाया।

देनदारों ने दलील दी कि पूरी संपत्ति बेचने की ज़रूरत नहीं थी, आंशिक बिक्री से भी डिक्री की राशि निकल सकती थी। हाई कोर्ट ने 2009 में इस तर्क को मंज़ूर किया और नीलामी को “अनुचित” बताते हुए पूरी प्रक्रिया दोबारा शुरू करने का आदेश दे दिया।

अदालत के अवलोकन

बहस के दौरान पीठ का ध्यान लगातार इसी बात पर था कि क्या देनदारों ने सही समय पर आपत्ति दर्ज कराई थी। जस्टिस संजय कुमार ने कई बार पूछा, “जब वे नोटिस लेकर पेश हुए, तो बिक्री घोषणा से पहले आपत्ति क्यों नहीं उठाई गई?”

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अदालत ने साफ किया कि सिविल प्रक्रिया संहिता की ऑर्डर 21 रूल 90(3) उन देनदारों को बाद में बिक्री चुनौती देने से रोकता है, जो पहले ही ऐसा कर सकते थे। पीठ ने टिप्पणी की, “उन्हें हर चरण में नोटिस मिला… उस समय कोई कदम न उठाकर अब 2002 की नीलामी दोबारा खोलने की उम्मीद नहीं की जा सकती।”

जजों ने यह भी नोट किया कि देनदार पहले किस्तों और Upset Price कम करने की सुनवाई में शामिल होते रहे, फिर अचानक अनुपस्थित रहने लगे। अदालत के अनुसार यह “मौन स्वीकृति” यानी Acquiescence थी।

एक और महत्वपूर्ण टिप्पणी आई जब Bench ने चेतावनी दी, “जिसने पैसे देकर कब्ज़ा लिया, उसे बिना अंत वाली मुकदमेबाज़ी में नहीं घसीटा जा सकता।” यह व्यावहारिक न्याय की ओर संकेत था।

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फैसला

निष्कर्ष में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट ने ऑर्डर 21 रूल 90(3) के कानूनी प्रतिबंध को नज़रअंदाज़ कर दिया। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने मूल नीलामी को बहाल किया, चेन्नई के अपीलीय अदालत के 2007 के आदेश की पुष्टि की, और एक्ज़िक्यूशन कोर्ट द्वारा 2004 में देनदारों की चुनौती खारिज किए जाने को सही ठहराया।

अपील स्वीकार कर ली गई, और अदालत ने यहीं मामला समाप्त कर दिया-बिना किसी पक्ष पर खर्च थोपे।

Case Title: G.R. Selvaraj (Dead) through LRs. vs. K.J. Prakash Kumar & Others

Case Number: Civil Appeal No. 8887 of 2011

Case Type: Civil Appellate – challenge to execution sale/auction validity

Decision Date: November 25, 2025

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