आज सुबह हुई संक्षिप्त सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने बौद्ध समुदाय के लिए अलग व्यक्तिगत कानून की मांग वाली याचिका पर सीधा दखल देने से इनकार कर दिया और पूरा मामला लॉ कमीशन ऑफ इंडिया को भेज दिया। मुख्य न्यायाधीश एस. सूर्या कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि संविधान में संशोधन करवाना अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं है, लेकिन उठाए गए मुद्दे “एक उचित सुनवाई के योग्य” हैं।
पृष्ठभूमि
बौद्ध पर्सनल लॉ एक्शन कमेटी द्वारा दायर इस याचिका में कहा गया था कि अलग धर्म होने के बावजूद बौद्ध समुदाय पर अभी भी हिंदू विवाह अधिनियम, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम जैसे हिंदू व्यक्तिगत कानून लागू हैं।
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याचिकाकर्ताओं का कहना था कि बौद्ध परंपराएं, विवाह और उत्तराधिकार के तरीके हिंदू प्रथाओं से काफी अलग हैं। अदालत में उनकी ओर से प्रस्तुत प्रतिनिधि ने कहा, “हमारी सामुदायिक पहचान धुंधली हो रही है, इसीलिए अलग कानून जरूरी है।”
अदालत की टिप्पणियाँ
मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि अदालत अधिकारों के उल्लंघन की जांच कर सकती है, लेकिन संसद को नया कानून बनाने का आदेश नहीं दे सकती। पीठ ने कहा, “अदालत संविधान में संशोधन का निर्देश नहीं दे सकती, लेकिन लॉ कमीशन अध्ययन करके सिफारिश कर सकता है। हम उनसे आपको सुनने का अनुरोध जरूर कर सकते हैं।”
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CJI ने यह भी याद दिलाया कि 21वें लॉ कमीशन की रिपोर्ट-जिसमें यूनिफॉर्म सिविल कोड पर चर्चा हुई-में इस तरह के मुद्दों का उल्लेख किया गया था। न्यायालय का मानना था कि यह विषय सामाजिक रूप से संवेदनशील है और किसी विशेषज्ञ संस्था द्वारा व्यापक अध्ययन बेहतर होगा।
पीठ के एक सदस्य ने कहा कि लॉ कमीशन के पास भेजने से “टुकड़ों में नहीं, बल्कि समग्र दृष्टिकोण से विचार” किया जा सकेगा।
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निर्णय
अंत में अदालत ने इस जनहित याचिका का निस्तारण कर दिया और इसे लॉ कमीशन के लिए प्रतिनिधित्व मानने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री को पूरा मामला आयोग को भेजने का आदेश दिया गया। अदालत ने यह भी कहा कि यदि लॉ कमीशन उचित समझे, तो याचिकाकर्ताओं को व्यक्तिगत रूप से बुलाकर उनका पक्ष सुने।
आदेश के अनुसार, अब यह आयोग तय करेगा कि बौद्ध समुदाय को अलग व्यक्तिगत कानून मिलना चाहिए या नहीं-अदालत ने इस मुद्दे से स्वयं को अलग कर लिया है।
Case Title: Buddhist Personal Law Action Committee vs. Union of India & Others
Case No.: W.P.(C) 1138/2025
Case Type: Public Interest Litigation (PIL)
Decision Date: 28 November 2025