मंगलवार की सुबह इलाहाबाद हाईकोर्ट में वातावरण सामान्य दिख रहा था, लेकिन एक साधारण-सा वेतन विवाद अचानक एक पुराने सिद्धांत को फिर से मजबूती से सामने ले आया-अगर आप ऊँचे पद का काम करते हैं, तो आपको उसी पद का वेतन मिलना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश अरुण भांसली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने उमाकांत पांडे बनाम संघ सरकार के मामले में विस्तृत फैसला सुनाकर लगभग दो दशकों से लंबित शिकायत को अंतिम रूप दिया।
पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता उमाkant पांडे ईस्ट सेंट्रल रेलवे इंटर कॉलेज, मुगलसराय में प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक (TGT) के रूप में कार्यरत थे। जब नियमित हेडमास्टर 30 नवंबर 2004 को सेवानिवृत्त हुए, तो पांडे को-3 नवंबर 2004 के एक छोटे-से कार्यालय आदेश के माध्यम से-स्थायी नियुक्ति होने तक टीचर इन-चार्ज के रूप में कार्यभार लेने को कहा गया। आदेश साधारण था, लेकिन इसके परिणाम वर्षों तक चले।
पांडे ने 1 दिसंबर 2004 से 6 मार्च 2008 तक यानी 3 वर्ष 4 महीने से अधिक समय तक हेडमास्टर के सभी दायित्व निभाए-चाहे प्रशासनिक निर्णय हों या विद्यार्थियों से जुड़ी जिम्मेदारियाँ। दिलचस्प बात यह रही कि बाद में उनके खिलाफ शुरू की गई विभागीय कार्यवाही में भी रेलवे प्रशासन ने उन्हें “हेड मास्टर (जूनियर विंग)” ही संबोधित किया, जिससे स्पष्ट होता है कि व्यवहार में उन्हें हेडमास्टर ही माना गया।
फिर भी, जब उन्होंने हेडमास्टर के वेतनमान (₹6500–10500) की मांग की, तो विभाग ने यह कहकर इनकार कर दिया कि उन्हें औपचारिक रूप से पदोन्नत नहीं किया गया था। केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने इस तर्क को मानते हुए 2023 में उनका दावा खारिज कर दिया।
अदालत के अवलोकन
हाईकोर्ट ने इस मामले को बिल्कुल अलग नजरिये से देखा। 2004 का आदेश और बाद की परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने कहा कि पांडे केवल “रूटीन” काम नहीं कर रहे थे। उन पर लगाए गए आरोप-टाइम-टेबल न बनाना, कक्षा निरीक्षण, उपस्थिति की निगरानी-ये सब दिखाते हैं कि वे संस्थान के प्रमुख की भूमिका निभा रहे थे। अदालत ने अपने तर्कों के माध्यम से इशारा किया कि “यह किसी साधारण देखरेख की जिम्मेदारी नहीं थी।”
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अदालत ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की:
“पीठ ने कहा, ‘स्कूल तीन साल से ज्यादा कैसे चलता यदि याचिकाकर्ता केवल रूटीन काम कर रहा होता? उसकी भूमिका स्पष्ट रूप से कार्यवाहक हेडमास्टर की थी।’”
न्यायाधीशों ने यह भी कहा कि “टीचर इन-चार्ज” शब्द की विभागीय व्याख्या सुविधानुसार की जा रही है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सेल्वराज बनाम पोर्ट ब्लेयर उपराज्यपाल के फैसले का उल्लेख करते हुए याद दिलाया कि अस्थायी रूप से भी यदि कोई कर्मचारी ऊँचे पद पर काम करता है तो उसे उस पद के वेतन का हकदार माना जाता है।
पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि बिना दस्तावेज संलग्न किए आंतरिक परिपत्रों पर निर्भर रहना “एक अजीब तरीका” है।
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फैसला
ट्रिब्यूनल का 2023 वाला आदेश रद्द करते हुए हाईकोर्ट ने निर्णय दिया कि पांडे को पूरे कार्यकाल के लिए हेडमास्टर के वेतनमान का भुगतान किया जाए, और TGT के रूप में जो वेतन दिया जा चुका है, उसका समायोजन कर दिया जाए।
इसके साथ ही अदालत ने निर्देश दिया कि उन्हें 11 अक्टूबर 2010 (जिस दिन उन्होंने O.A. दायर की थी) से लेकर वास्तविक भुगतान होने तक 6% साधारण ब्याज भी दिया जाए। यह पूरी प्रक्रिया दो महीने के भीतर पूरी करनी होगी जब संबंधित प्राधिकारी को प्रमाणित आदेश की प्रति प्राप्त हो जाएगी।
इस तरह, लगभग 19 साल पुराना विवाद आखिरकार समाप्त हो गया।
Case Title: Uma Kant Pandey vs Union of India & Others
Case No.: Writ-A No. 6079 of 2025
Case Type: Service Matter – Writ Petition (Salary/Payscale Entitlement)
Decision Date: 11 November 2025









