इलाहाबाद: बुधवार को जारी एक विस्तृत आदेश में, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शाहजहांपुर के चार निवासियों के खिलाफ जारी समन आदेश को रद्द करते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के अनिवार्य प्रावधानों का पालन नहीं किया। सुबह भर चली सुनवाई के दौरान पीठ ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि गैर-संज्ञेय अपराधों में “सज़ा से पहले प्रक्रिया” सबसे महत्वपूर्ण है।
पृष्ठभूमि
मामला शाहजहांपुर के तिलहर का है, जहां पड़ोसियों के बीच नाली के गंदे पानी को लेकर झगड़ा शुरू हुआ। गैर-संज्ञेय पुलिस रिपोर्ट के अनुसार, प्रेंपाल के नए बने शौचालय से गंदा पानी बहकर रामनाथ की नाली में पहुंच रहा था। बहस बढ़ी, आवाज़ें ऊँची हुईं, और शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि उसके साथ गाली-गलौज और लाठियों से मारपीट की गई।
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मजिस्ट्रेट की अनुमति के बाद पुलिस ने जांच की और भारतीय न्याय संहिता की धारा 115(2) (स्वेच्छा से चोट पहुँचाना) और धारा 352 (शांति भंग कराने के इरादे से अपमान) के तहत चार्जशीट दाखिल की-दोनों गैर-संज्ञेय अपराध। इसके बाद न्यायिक मजिस्ट्रेट ने संज्ञान लेते हुए आरोपियों को समन कर दिया।
हालाँकि, आवेदकों का कहना था कि मामला बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है, राजनीतिक रूप से प्रेरित है और प्रक्रिया पूरी तरह दोषपूर्ण है।
अदालत के अवलोकन
न्यायमूर्ति प्रवीन कुमार गिरी ने सीधे प्रक्रिया संबंधी मुद्दे पर ध्यान केंद्रित किया। चार्जशीट में केवल गैर-संज्ञेय अपराधों का खुलासा था, फिर भी मजिस्ट्रेट ने उसे शिकायत के बजाय राज्य मामला मानकर कार्यवाही की-जो BNSS के अनुसार गलत है।
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पीठ ने टिप्पणी की, “जब पुलिस रिपोर्ट केवल गैर-संज्ञेय अपराध दिखाती है, तो कानून इसे शिकायत मानने का आदेश देता है। इसे नज़रअंदाज़ करना अनुच्छेद 21 में दिए गए न्यायोचित प्रक्रिया के अधिकार का उल्लंघन है।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि मजिस्ट्रेट ने आरोपियों को समन जारी करने से पहले सुनवाई का अवसर नहीं दिया और आदेश पर अपना नाम, पद और न्यायिक आईडी का उल्लेख भी नहीं किया-जिसके पालन का हाईकोर्ट पहले ही ट्रायल कोर्ट को निर्देश दे चुका है।
भीड़ भरी अदालत में राज्य पक्ष हल्का असहज दिखा जब जज ने कहा, “किसी नागरिक को अदालत में तलब करना एक गंभीर कार्रवाई है, यह महज़ औपचारिकता नहीं है।”
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निर्णय
समन आदेश को कानूनन अस्थिर मानते हुए हाईकोर्ट ने इसे रद्द कर दिया और मामले को न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास यह निर्देश देते हुए वापस भेज दिया कि वह BNSS के मुताबिक मामले पर दोबारा विचार करें-इस बार पुलिस रिपोर्ट को शिकायत की तरह मानते हुए और सभी प्रक्रिया संबंधी संरक्षण उपलब्ध कराते हुए।
इसके साथ ही आवेदन निस्तारित कर दिया गया।
Case Title: Prempal & 3 Others vs. State of Uttar Pradesh & Another
Case Number: Application U/S 528 BNSS No. 1624 of 2025
Case Type: Criminal Miscellaneous Application (under Section 528 BNSS)
Decision Date: 26 November 2025










