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राजस्थान हाईकोर्ट ने 63 आदिवासी कांस्टेबलों को वर्षों की देरी के बाद TSP क्षेत्रों में भेजने का आदेश दिया, भर्ती वादे पर उठाए गंभीर सवाल

Vivek G.

नकुल पाटीदार एवं अन्य बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य, वर्षों की देरी के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने 63 आदिवासी कांस्टेबलों को TSP क्षेत्रों में भेजने का आदेश दिया, भर्ती वादों की अनदेखी पर कड़ा रुख दिखाया।

राजस्थान हाईकोर्ट ने 63 आदिवासी कांस्टेबलों को वर्षों की देरी के बाद TSP क्षेत्रों में भेजने का आदेश दिया, भर्ती वादे पर उठाए गंभीर सवाल

जोधपुर स्थित राजस्थान हाईकोर्ट में 19 नवंबर 2025 को हुई सुनवाई में माहौल कई बार तीखा भी हुआ और कभी-कभी अदालत के धैर्य की भी परीक्षा दिखी। लगभग एक दशक से अपने ही TSP (ट्राइबल सब-प्लान) क्षेत्रों में सेवा का इंतज़ार कर रहे 63 युवा कांस्टेबलों को आखिरकार राहत मिली। जस्टिस फर्ज़न्द अली ने रिकॉर्ड की लंबी फाइलें देखने और पक्षों को सुनने के बाद राज्य सरकार को आदेश दिया कि सभी याचियों को जल्द से जल्द TSP क्षेत्रों, खासकर महाराणा प्रताप बटालियन, प्रतापगढ़ में स्थानांतरित किया जाए।

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पृष्ठभूमि

यह मामला 2013 में जारी एक विज्ञापन से शुरू हुआ था, जिसमें मिनरल प्रोटेक्शन फोर्स के लिए 1,000 कांस्टेबल पद निकाले गए थे। इस शीर्षक ने स्वाभाविक रूप से यह विश्वास पैदा किया था कि नियुक्ति के बाद तैनाती बांसवाड़ा, डूंगरपुर, उदयपुर और सालुम्बर जैसे खनिज-समृद्ध आदिवासी क्षेत्रों में ही होगी। इन पदों में से 80 TSP उम्मीदवारों के लिए आरक्षित थे। सभी याची, जो अधिसूचित आदिवासी समुदायों से आते हैं, परीक्षा में सफल हुए और जनवरी 2016 में नियुक्त हुए।

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लेकिन यहीं से स्थिति बिगड़ गई। TSP यूनिटों में पोस्टिंग देने के बजाय, 2015 के एक विलय आदेश के बाद सभी को राजस्थान आर्म्ड कॉन्स्टेबुलरी (RAC) की 14वीं बटालियन, जयपुर में समायोजित कर दिया गया। जिन क्षेत्रों के संरक्षण के नाम पर भर्ती हुई थी, वहां इनमें से कोई भी कभी तैनात नहीं हुआ।

2018 में फिर उम्मीद जगी, जब राज्य सरकार ने केंद्र द्वारा अनुसूचित क्षेत्रों की नई अधिसूचना जारी होने के बाद TSP निवासी कर्मचारियों से स्थानांतरण विकल्प मांगा। याचियों ने समय पर फॉर्म भरे, कमांडेंट ने भी समर्थन किया, लेकिन कुछ भी आगे नहीं बढ़ा। उनके वकील ने दलील दी, “हमने ईमानदारी से सेवा की, मगर हमारी अर्जी कहीं दबा दी गई।”

अदालत की टिप्पणियाँ

जस्टिस अली ने राज्य सरकार के तर्कों पर कड़ी नजर डाली। 2013 की भर्ती संरचना का जिक्र करते हुए अदालत ने कहा कि आदिवासी क्षेत्रों में पोस्टिंग की उम्मीद करना पूरी तरह उचित था। न्यायाधीश ने टिप्पणी की, “जब विज्ञापन किसी तरह से आदिवासी/खनिज क्षेत्रों से जुड़ाव दर्शाता है, तो उम्मीदवार के मन में वैध अपेक्षा पैदा होती है।”

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अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि मिनरल प्रोटेक्शन फोर्स नामक भर्ती और TSP आरक्षण देने के बावजूद, एक भी भर्ती - एक भी नहीं - वास्तव में मिनरल प्रोटेक्शन फोर्स में तैनात नहीं की गई। सबको जयपुर भेज दिया गया, वह भी अधिकतर कार्यालय सुरक्षा ड्यूटी पर।

सुनवाई के दौरान न्यायाधीश ने यह भी कहा कि “राज्य भर्ती के समय आकर्षक वादा कर सकता है, लेकिन बाद में बिना किसी तार्किक आधार के उससे पूरी तरह पीछे नहीं हट सकता।” यह टिप्पणी पूरे मामले का सार जैसे कमरे में गूंज गई।

उत्तर में राज्य ने प्रशासनिक सीमाएँ, रिक्तियों की कमी और स्थानांतरण को पूर्ण अधिकार न बताकर बचाव करने की कोशिश की। लेकिन अदालत इससे संतुष्ट नहीं दिखी, खासकर तब, जब रिकॉर्ड में यह साफ था कि कई अन्य समान स्थिति वाले कर्मचारियों को लाभ दिया जा चुका था।

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निर्णय

कई वर्षों से “बिना उपचार के छोड़े गए” याचियों के लिए अदालत ने हस्तक्षेप करते हुए न्यायसंगत संतुलन कायम किया। आदेश दिया गया कि -

  • सभी 63 याचियों को महाराणा प्रताप बटालियन, प्रतापगढ़ में स्थानांतरित किया जाए, और
  • आवश्यकता पड़ने पर प्रशासनिक जरूरत के अनुसार उन्हें किसी भी TSP अधिसूचित जिले में समायोजित किया जा सकता है।

आदेश यहीं समाप्त होता है, पर इससे यह संदेश स्पष्ट हो गया कि आदिवासी उम्मीदवारों को भर्ती के वादों के बाद किनारे नहीं किया जा सकता।

Case Title: Nakul Patidar & Others vs. State of Rajasthan & Others

Case No.: S.B. Civil Writ Petition No. 10154/2019

Case Type: Civil Writ Petition (Transfer to TSP Area)

Decision Date: 19 November 2025

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