28 नवंबर 2025 को दिए गए एक सख्त और सीधी टिप्पणी वाले निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का वह आदेश रद्द कर दिया, जिसमें आस्था @ सारिका की कथित दहेज मृत्यु के मामले में आरोपी पति राघवेन्द्र सिंह को जमानत दी गई थी। जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने सुनवाई के दौरान गहरी चिंता दिखाई-खासकर तब, जब पता चला कि विवाह को चार महीने भी पूरे नहीं हुए थे और युवती की मौत संदिग्ध परिस्थितियों में हुई थी।
पृष्ठभूमि
कोर्टरूम नंबर....में माहौल भारी था। अपीलकर्ता-आस्था के पिता-ने घटनाओं की पूरी श्रृंखला सुनाई: 22 फरवरी 2023 को हुआ विवाह, उसके बाद लगातार दहेज की मांगें जिनमें एक फ़ॉर्च्यूनर कार भी शामिल थी, आधी रात का घबराया हुआ फोन कॉल, और अंततः वह क्षण जब कथित तौर पर “बदबूदार पदार्थ” जबरन पिलाए जाने के बाद आस्था गिर पड़ी।
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पीठ ने खास ध्यान तब दिया जब बताया गया कि पोस्टमॉर्टम में उसकी बांह पर खुरंच का निशान दर्ज था और FSL रिपोर्ट में एल्युमिनियम फॉस्फाइड ज़हर की पुष्टि हुई-एक ऐसा रसायन जिसे ग्रामीण इलाकों में होने वाली असामान्य मौतों से अक्सर जोड़ा जाता है।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि FIR में पति के साथ कई ससुराल वाले नामज़द किए गए थे, लेकिन चार्जशीट सिर्फ पति के खिलाफ दाखिल हुई-जिससे प्रारंभिक जांच की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठे।
अदालत की टिप्पणियाँ
सुनवाई के दौरान यह साफ दिख रहा था कि पीठ हाईकोर्ट के दृष्टिकोण से संतुष्ट नहीं थी। एक बिंदु पर जजों ने टिप्पणी की-“हाईकोर्ट महत्वपूर्ण तथ्यों को नजरअंदाज करता हुआ प्रतीत होता है”-संकेत देते हुए कि ऐसी अनदेखी उन मामलों में बिल्कुल स्वीकार्य नहीं है जिनमें विवाह के कुछ ही महीनों में युवती की संदिग्ध मौत हो गई हो।
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सुप्रीम कोर्ट ने कई गंभीर पहलुओं पर जोर दिया:
- पिता और बड़ी बहन को किए गए Dying Declarations स्पष्ट और लगातार एक जैसे थे।
- मौत विवाह के केवल चार महीने बाद हुई-सात साल की उस अवधि के भीतर, जिसमें दहेज मृत्यु की वैधानिक धारणा स्वतः लागू होती है।
- धारा 161 सीआरपीसी के तहत दर्ज बयान दहेज मांग और लगातार प्रताड़ना को मजबूती से दर्शाते हैं।
- हाईकोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 113B को पूरी तरह अनदेखा किया, जबकि यह धारा यह मानने को बाध्य करती है कि यदि मृत्यु से पहले दहेज संबंधित प्रताड़ना सिद्ध हो जाए, तो आरोपी के खिलाफ दोष की धारणा बनती है।
- जांच में देरी-जैसे पति की देर से गिरफ्तारी और बाद में जांच का CB-CID को सौंपा जाना-स्पष्ट खामियों को दिखाते हैं।
पीठ ने साफ शब्दों में कहा: “जमानत पर्याप्त मूल्यांकन के बिना दी गई थी। यह आदेश टिक नहीं सकता।”
एक अन्य टिप्पणी में कोर्ट ने कहा: “ऐसे मामलों में न्यायिक नरमी अपराधियों को प्रोत्साहित ही करेगी और जनविश्वास को कमजोर करेगी।”
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जजों ने विवाह के बढ़ते व्यापारिक रूप पर खेद भी व्यक्त किया, यह कहते हुए कि दहेज “उपहार” के नाम पर छिपा हुआ एक सामाजिक अभिशाप है। उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह की मौतें निजी पारिवारिक त्रासदी भर नहीं बल्कि समाज की सामूहिक अंतरात्मा को झकझोरने वाला अपराध हैं।
निर्णय
अंत में सुप्रीम कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि हाईकोर्ट ने न केवल आवश्यक कानूनी सिद्धांतों को नजरअंदाज किया बल्कि महत्वपूर्ण सबूतों की अनदेखी भी की। इसलिए जमानत आदेश रद्द किया जाता है और आरोपी पति को तुरंत आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया जाता है। यदि वह ऐसा नहीं करता, तो संबंधित अधिकारी उसे हिरासत में ले लें।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यह फैसला केवल जमानत से संबंधित है और ट्रायल स्वतंत्र रूप से और विधि के अनुसार आगे बढ़ेगा।
Case Title: Yogendra Pal Singh v. Raghvendra Singh @ Prince & Another
Case Number: Criminal Appeal (Arising out of SLP (Crl.) No. 8075 of 2025)
Case Type: Criminal Appeal – Cancellation of Bail in Dowry Death Case
Decision Date: 28 November 2025










