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सुप्रीम कोर्ट ने मानसा दुर्घटना मामले में बढ़ाई मुआवज़े की राशि, ब्याज दर बहाल की और भाई-बहनों के अधिकारों को मान्यता दी

Vivek G.

अजमेर कौर और अन्य बनाम मोहिंदर सिंह और अन्य, सुप्रीम कोर्ट ने मानसा एक्सीडेंट केस में मुआवज़ा बढ़ाया, भाई-बहनों के संतान संबंधी अधिकारों को मान्यता दी, और निष्पक्षता के लिए 8% ब्याज बहाल किया।

सुप्रीम कोर्ट ने मानसा दुर्घटना मामले में बढ़ाई मुआवज़े की राशि, ब्याज दर बहाल की और भाई-बहनों के अधिकारों को मान्यता दी

गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई संक्षिप्त लेकिन तीखी सुनवाई के दौरान, अदालत ने पंजाब के मानसा ज़िले में 2008 में हुई सड़क दुर्घटना के पीड़ित परिवार को मिली मुआवज़ा राशि पर पुनर्विचार किया। अजमेर कौर और उनके तीन परिवारजनों द्वारा दायर अपील पर सुनवाई करते हुए पीठ ने स्पष्ट किया कि पहले किए गए आकलन में कई कमियाँ रह गई थीं। अदालत और वकीलों के बीच हुई यह बातचीत लगभग घरेलू-सी लग रही थी-जैसे न्याय और गणित दोनों एक-दूसरे से जूझ रहे हों।

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पृष्ठभूमि

परिवार ने सबसे पहले मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल (MACT) का दरवाज़ा खटखटाया था, जिसने मृतक की आय ₹2,500 प्रति माह तय की थी। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने भी इसी राशि को सही माना और ब्याज दर 8% से घटाकर 6% कर दी। लेकिन परिवार का कहना था कि यह रकम वास्तविक आय को नहीं दर्शाती। मृतक की मां ने गवाही में बताया था कि उनका बेटा मज़दूरी के साथ दूध बेचकर भी कमाई करता था। लगभग 17 साल से परिवार इन तथ्यों को मान्यता दिलाने की लड़ाई लड़ रहा था।

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सुप्रीम कोर्ट में दायर अपील पूरी मुआवज़ा राशि को लेकर नहीं थी; परिवार ने विशेष रूप से तीन बिंदुओं पर आपत्ति जताई-मृतक की आय, भाई-बहनों के लिए ‘फिलियल कंसोर्टियम’ (साथ/सहारा खोने पर मिलने वाला मुआवज़ा), और घटाई गई ब्याज दर।

अदालत की टिप्पणियाँ

सुनवाई की शुरुआत से ही न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने संकेत दिया कि हाई कोर्ट का आकलन शायद अधूरा रह गया था।

पीठ ने कहा, “₹2,500 की आय तय करना सबूतों के खिलाफ था,” और गवाही व न्यूनतम मजदूरी के आधार पर आय कम से कम ₹3,300 प्रति माह मानी जानी चाहिए।

फिलियल कंसोर्टियम का मुद्दा सुनवाई का अहम हिस्सा रहा। प्रतिवादियों के वकील ने दलील दी कि प्रणय सेठी फैसले में भाई-बहनों के लिए यह मुआवज़ा नहीं है। लेकिन पीठ ने स्पष्ट रुख अपनाया।

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न्यायाधीशों ने कहा, “मग्मा के फैसले में भाई-बहनों को भी फिलियल कंसोर्टियम का अधिकार दिया गया है।” साथ ही यह भी कहा कि कुछ भाई-बहन बाद में कार्यवाही में शामिल हुए, इससे उनके अधिकार खत्म नहीं हो जाते।

जब एक वकील ने कहा कि चूंकि वे मूल याचिकाकर्ता नहीं थे इसलिए उन्हें लाभ नहीं मिलना चाहिए, तो अदालत ने सख्त टिप्पणी की-“कानून के खिलाफ कोई रोक (estoppel) नहीं हो सकती।”

ब्याज दर पर भी अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट ने 8% से 6% करना गलत था और इसे वापस 8% किया जाना चाहिए।

निर्णय

सुनवाई के अंत में, अदालत ने चारों भाई-बहनों को ₹40,000 प्रति व्यक्ति-कुल ₹2 लाख-फिलियल कंसोर्टियम के रूप में स्वीकृत किया। मासिक आय को बढ़ाकर ₹3,300 माना गया और ब्याज दर फिर से 8% कर दी गई। सभी पक्षों द्वारा पुनर्गणना के बाद कुल मुआवज़ा (ब्याज छोड़कर) ₹7,79,533 तय किया गया।

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अदालत ने निर्देश दिया कि यह राशि, पहले से दिए गए भुगतान को समायोजित करने के बाद, दो महीने के भीतर MACT में जमा की जाए। ट्रिब्यूनल इसे दो सप्ताह के भीतर पीड़ित परिवार के खातों में स्थानांतरित करेगा। इस प्रकार, अपील स्वीकृत की गई और परिवार के लिए लंबा संघर्ष यहाँ समाप्त हुआ।

Case Title: Ajmer Kaur & Others vs Mohinder Singh & Others

Case No.: Civil Appeal (Arising out of SLP (C) No. 11469 of 2022)

Case Type: Civil Appeal – Motor Accident Compensation (MACT) Enhancement

Decision Date: 15 May 2025

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