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परिसीमा अधिनियम

परिसीमा अधिनियम: धारा 5 के अंतर्गत विलंब क्षमा (condonation of delay) हेतु प्रार्थना‑पत्र का हिंदी ड्राफ्ट, ‘सुफीशिएंट कॉज़’, दायरा, जजमेंट्स और ड्राफ्टिंग टिप्स।

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Quick Overview

यह ‘परिसीमा अधिनियम’ पेज धारा 5 के अंतर्गत विलंब क्षमा के लिए प्रार्थना‑पत्र का उपयोगी हिंदी ड्राफ्ट प्रस्तुत करता है, जिससे अपील/आवेदन नियत अवधि के बाद भी ‘सुफीशिएंट कॉज़’ सिद्ध कर दाखिल किए जा सकें। इसमें सुप्रीम कोर्ट के मार्गदर्शक सिद्धांत, धारा 3 बनाम धारा 5 का संतुलन, स्वीकार्य कारणों के उदाहरण, और ठोस दस्तावेज‑आधारित ड्राफ्टिंग टिप्स शामिल हैं, ताकि bona fide मामलों में न्यायालय का विवेक प्रभावी ढंग से आमंत्रित किया जा सके।

FAQs

परिसीमा अधिनियम की धारा 5 क्या कहती है?

धारा 5 के अनुसार अपील या आवेदन (Order XXI CPC के आवेदन छोड़कर) नियत अवधि के बाद भी अदालत ‘सुफीशिएंट कॉज़’ सिद्ध होने पर स्वीकार कर सकती है।

धारा 5 किन मामलों पर लागू नहीं होती?

धारा 5 ‘सूट’ पर लागू नहीं होती; यह मुख्यत: अपीलों और आवेदनों पर लागू है, जबकि Order XXI CPC के अंतर्गत आने वाले आवेदन इससे अपवाद हैं।

‘सुफीशिएंट कॉज़’ का अर्थ क्या है?

कानून में इसकी परिभाषा नहीं है; अदालत तथ्य‑परिस्थितियों के आधार पर तय करती है कि विलंब नियंत्रण से बाहर कारणों से हुआ, लापरवाही नहीं थी, और आवेदक ने परिश्रम व bona fides दिखाए।

सुप्रीम कोर्ट ने विलंब क्षमा के क्या मार्गदर्शक सिद्धांत दिए हैं?

Collector, Land Acquisition v. Katiji में कहा गया कि न्यायहित को वरीयता, हर दिन की देरी की व्यावहारिक व्याख्या, और सामान्यतः देरी से लाभ न होना—जैसे सिद्धांत अपनाए जाएं।

क्या हर मामले में उदार व्याख्या ही होगी?

नहीं; हालिया सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 5 की उदारता का दुरुपयोग कर ‘stale’ मामलों को पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता और लापरवाही/निष्क्रियता पर देरी क्षमा नहीं होगी।

धारा 3 और धारा 5 में संतुलन कैसे देखा जाता है?

धारा 3 का अनुपालन सख्त है (समय‑सीमा बीतने पर वाद अस्वीकार), जबकि धारा 5 में न्यायालय सीमित उदार विवेक से ‘सुफीशिएंट कॉज़’ होने पर समय बढ़ा सकता है।

धारा 5 का आवेदन ड्राफ्ट करते समय क्या शामिल करें?

तिथिवार घटनाक्रम, देरी की अवधि, देरी के कारणों का ठोस स्पष्टीकरण, समर्थन दस्तावेज, आवेदक का परिश्रम व bona fides का विवरण, और न्यायहित के आधार।

किन कारणों को प्राय: ‘सुफीशिएंट कॉज़’ माना गया है?

गंभीर बीमारी, कानूनी सलाह में त्रुटि, प्राधिकरण से प्रतियों में देरी, प्राकृतिक आपदा/अप्रत्याशित परिस्थितियां—पर mere लापरवाही स्वीकार्य नहीं।

राज्य/सरकारी पक्षों के लिए कोई अलग मानदंड है?

अदालतें सिद्धांततः समान कसौटी लागू करती हैं; संतोषजनक स्पष्टीकरण होने पर ही राज्य या निजी—किसी का भी विलंब क्षमा किया जा सकता है।

क्या विलंब क्षमा ‘अधिकार’ है?

नहीं; यह न्यायालय का विवेकाधीन क्षेत्र है—संतोषजनक कारण व प्रमाण पर ही समयवृद्धि मिलती है, स्वतः अधिकार नहीं।