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11 साल के रिश्ते में धोखे का आरोप: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यौन शोषण केस में हस्तक्षेप से किया इनकार

Shivam
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कुलदीप वर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य - इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 11 साल के रिश्ते के मामले में एफआईआर रद्द करने की याचिका खारिज कर दी, कहा कि धारा 69 बीएनएस के तहत आरोपों पर पूर्ण सुनवाई की आवश्यकता है।

11 साल के रिश्ते में धोखे का आरोप: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यौन शोषण केस में हस्तक्षेप से किया इनकार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम आदेश में झूठे विवाह के वादे पर लंबे समय तक शारीरिक संबंध बनाने के आरोपों से जुड़े मामले में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि मुकदमे की कार्यवाही कानून का दुरुपयोग है। ऐसे मामलों में साक्ष्यों की गहराई से जांच ट्रायल के दौरान ही हो सकती है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला कुलदीप वर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य से जुड़ा है। अभियुक्त ने हाईकोर्ट में आवेदन दाखिल कर चार्जशीट, संज्ञान आदेश और ट्रायल की पूरी कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी।

पीड़िता की ओर से दर्ज एफआईआर में आरोप लगाया गया कि वह करीब 11 वर्षों से अभियुक्त के साथ रिश्ते में थी। इस दौरान अभियुक्त ने विवाह का झूठा वादा कर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए, मारपीट की और बदनाम करने की धमकी भी दी। एफआईआर(FIR) में भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 69, 115(2), 352 और 351(3) के तहत अपराध दर्ज किए गए।

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पक्षकारों की दलीलें

अभियुक्त की ओर से दलील दी गई कि दोनों के बीच संबंध सहमति से थे और पीड़िता खुद को उसकी पत्नी बताती रही है। यह भी कहा गया कि आर्य समाज मंदिर में विवाह हो चुका था, इसलिए “झूठे विवाह के वादे” का आरोप टिकाऊ नहीं है।

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वहीं पीड़िता और राज्य की ओर से कहा गया कि अभियुक्त पहले से शादीशुदा था और उसने यह तथ्य छिपाकर पीड़िता को लंबे समय तक धोखे में रखा। पीड़िता का दावा था कि उसे अभियुक्त की शादी और बच्चों के बारे में जानकारी एफआईआर दर्ज होने के बाद मिली।

कोर्ट की टिप्पणियां

न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना ने रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री का परीक्षण करते हुए कहा कि आरोपों से प्रथम दृष्टया यह सामने आता है कि पीड़िता और अभियुक्त लंबे समय तक साथ रहे और विवाह का वादा इस रिश्ते का अहम आधार था।

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कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 एक नई व्यवस्था है, जो बलात्कार से अलग “धोखे से शारीरिक संबंध” को दंडनीय बनाती है। पीठ ने कहा,

“यह तय करना कि विवाह का वादा शुरू से ही झूठा था या बाद में टूटा, साक्ष्यों के आधार पर ट्रायल में ही तय किया जा सकता है।”

निर्णय

हाईकोर्ट ने माना कि इस स्तर पर चार्जशीट और आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने का कोई ठोस आधार नहीं है। अदालत ने कहा कि अभियुक्त पहले से विवाहित था और इस तथ्य का प्रभाव मामले के अंतिम निष्कर्ष पर पड़ेगा, जिसका निर्णय ट्रायल के बाद ही संभव है।

अंततः अदालत ने धारा 528 BNSS के तहत दाखिल याचिका खारिज कर दी और ट्रायल जारी रखने का आदेश दिया।

Case Title: Kuldeep Verma v. State of Uttar Pradesh & Another

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