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11 साल जेल में, अपील लंबित: सुप्रीम कोर्ट ने मर्डर केस में उम्रकैद की सजा की निलंबन दी राहत

Vivek G.
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मुना बिसोई बनाम ओडिशा राज्य, सुप्रीम कोर्ट ने मर्डर केस में 11 साल से जेल में बंद आरोपी की उम्रकैद की सजा निलंबित की, हाई कोर्ट को 6 माह में अपील निपटाने का निर्देश।

11 साल जेल में, अपील लंबित: सुप्रीम कोर्ट ने मर्डर केस में उम्रकैद की सजा की निलंबन दी राहत

दिल्ली में शुक्रवार की सुबह जब अदालत की कार्यवाही शुरू हुई, तो माहौल गंभीर था। मामला एक ऐसे व्यक्ति का था जो पिछले 11 साल से जेल में है, जबकि उसकी अपील अब तक सुनी ही नहीं गई।

सुप्रीम कोर्ट ने मुणा बिसोई बनाम राज्य ओडिशा मामले में अहम आदेश देते हुए उम्रकैद की सजा को निलंबित कर दिया और आरोपी को अंतरिम जमानत पर जारी रखने का निर्देश दिया। यह आदेश 16 फरवरी 2026 को न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने सुनाया।

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मामले की पृष्ठभूमि

मुणा बिसोई को सत्र न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की धारा 302/34 (हत्या और समान मंशा) और आर्म्स एक्ट की धारा 27 के तहत दोषी ठहराया था। उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई।

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इसके खिलाफ 2016 में High Court of Orissa में आपराधिक अपील (Crl. Appeal No. 552 of 2016) दायर की गई।

लेकिन लगभग एक दशक बीत जाने के बाद भी अपील पर अंतिम सुनवाई नहीं हो सकी। इस बीच बिसोई 11 साल से अधिक समय तक जेल में रहे।

अक्टूबर 2025 में हाई कोर्ट ने सजा निलंबित करने की मांग ठुकरा दी, हालांकि तीन महीने की अंतरिम जमानत दे दी थी। वह अवधि 22 जनवरी 2026 को समाप्त होनी थी। ठीक उसी समय बिसोई ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

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सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में क्या हुआ

सुनवाई के दौरान पीठ ने लंबित अपीलों और देरी पर चिंता जताई। अदालत ने साफ कहा कि अपील का अधिकार कानून द्वारा दिया गया अधिकार है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

पीठ ने कहा, “अगर अपील अंततः सफल हो जाए और तब तक आरोपी वर्षों जेल में रह चुका हो, तो यह गंभीर न्यायिक विफलता होगी।”

कोर्ट ने माना कि हाई कोर्ट के पास अपने कारण हो सकते हैं, लेकिन देरी का खामियाजा आरोपी को नहीं भुगतना चाहिए। रिकॉर्ड में ऐसा कुछ नहीं था जिससे यह लगे कि अपील की देरी के लिए खुद आरोपी जिम्मेदार था।

‘कश्मीरा सिंह’ केस का हवाला

पीठ ने 1977 के ऐतिहासिक फैसले Kashmira Singh v. State of Punjab का उल्लेख किया। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि अपील कई सालों तक नहीं सुनी जा सकती, तो केवल इस आधार पर कि सजा उम्रकैद है, जमानत से इनकार करना न्यायसंगत नहीं होगा।

उस पुराने फैसले की पंक्तियों को याद करते हुए पीठ ने दोहराया कि,“कोई भी प्रथा अगर अन्याय पैदा करती है तो उसे बदला जाना चाहिए। अदालत का हर कदम न्याय के हित में होना चाहिए।”

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अदालत ने सवाल उठाया था-क्या कोई व्यक्ति अपनी पूरी सजा काट ले और बाद में बरी हो जाए, तो क्या उस अन्याय की भरपाई संभव है?

अदालत का फैसला

इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया।

पीठ ने स्पष्ट किया कि मुणा बिसोई की उम्रकैद की सजा को निलंबित किया जाता है और उन्हें अंतरिम जमानत पर जारी रहने दिया जाएगा, जब तक हाई कोर्ट कोई अलग आदेश पारित न करे।

साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा हाई कोर्ट से अनुरोध किया कि अपील का निपटारा छह महीने के भीतर करने का प्रयास किया जाए।

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कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि अपीलकर्ता स्वयं सुनवाई में रुचि नहीं दिखाता है, तो हाई कोर्ट किसी वकील को एमिकस क्यूरी (अदालत की सहायता के लिए नियुक्त अधिवक्ता) नियुक्त कर मामले का फैसला कर सकता है।

याचिका से जुड़ी अन्य लंबित अर्जियां भी निपटा दी गईं।

Case Title: Muna Bisoi v. State of Odisha

Case No.: Criminal Appeal (Arising out of SLP (Crl.) No. 163/2026)

Decision Date: February 16, 2026

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