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कुछ दिनों तक पत्नी से बात न करना धारा 498A के तहत क्रूरता नहीं है, पत्नी की आत्महत्या के मामले में पति बरी: सर्वोच्च न्यायालय

CB News Desk
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सुप्रीम कोर्ट ने धारा 498A के तहत दोषी ठहराए गए पति को बरी करते हुए कहा कि केवल 13 दिनों तक पत्नी से बात न करना, बिना ठोस सबूत के, क्रूरता नहीं माना जा सकता। - जयेश कन्ना बनाम सहायक आयुक्त विधि एवं व्यवस्था (पश्चिम) और अन्य

 कुछ दिनों तक पत्नी से बात न करना धारा 498A के तहत क्रूरता नहीं है, पत्नी की आत्महत्या के मामले में पति बरी: सर्वोच्च न्यायालय

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि पति द्वारा कुछ दिनों तक पत्नी से फोन पर बात न करना अपने आप में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत "क्रूरता" नहीं माना जा सकता। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष इस आरोप को साबित करने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य पेश नहीं कर सका।

न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने 7 मई 2026 को यह फैसला सुनाया।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला जयेश कन्ना की पत्नी संगीता की मृत्यु से जुड़ा है। संगीता ने 31 जनवरी 2015 को अपने मायके में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि विवाह के बाद उसे दहेज की मांग और मानसिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा।

ट्रायल कोर्ट ने दहेज मृत्यु और दहेज उत्पीड़न से जुड़े आरोपों में पति के अन्य परिजनों को बरी कर दिया था। पति को भी धारा 304B (दहेज मृत्यु) के आरोप से मुक्त कर दिया गया, लेकिन धारा 498A के तहत दोषी ठहराया गया। अदालत ने माना था कि पत्नी के मायके जाने के बाद पति द्वारा उससे बात न करना मानसिक क्रूरता के दायरे में आता है।

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बाद में मद्रास हाईकोर्ट ने भी इस दोषसिद्धि को बरकरार रखा।

सुप्रीम कोर्ट ने धारा 498A के प्रावधानों का विश्लेषण करते हुए कहा कि हर वैवाहिक विवाद या मतभेद को क्रूरता नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि मानसिक क्रूरता का निर्धारण प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए।

पीठ ने कहा,

“मानसिक क्रूरता तय करने के लिए कोई एक समान नियम नहीं हो सकता जिसे हर मामले में लागू किया जाए।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि क्रूरता साबित करने के लिए यह दिखाना आवश्यक है कि आरोपी का व्यवहार इतना गंभीर था कि उससे महिला आत्महत्या करने या गंभीर मानसिक नुकसान झेलने के लिए मजबूर हो सकती थी।

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि पति के खिलाफ मुख्य आरोप केवल इतना था कि उसने 18 जनवरी 2015 से 31 जनवरी 2015 के बीच पत्नी से फोन पर बात नहीं की।

अदालत ने कहा कि इस आरोप के समर्थन में केवल मृतका के माता-पिता और बहन की मौखिक गवाही प्रस्तुत की गई। कॉल डिटेल रिकॉर्ड या अन्य तकनीकी साक्ष्य पेश नहीं किए गए, जबकि ऐसे रिकॉर्ड इस आरोप की पुष्टि कर सकते थे।

पीठ ने कहा कि केवल व्हाट्सऐप संदेशों की अनुपस्थिति से यह साबित नहीं होता कि दोनों के बीच कोई बातचीत नहीं हुई, क्योंकि बातचीत सामान्य फोन कॉल के माध्यम से भी हो सकती थी।

सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष धारा 498A के आवश्यक तत्वों को साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है।

पीठ ने कहा कि

“तेरह दिनों तक बातचीत न करना, और उस आरोप को ठोस साक्ष्य से सिद्ध न कर पाना, किसी भी तरह से क्रूरता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।”

अदालत ने ट्रायल कोर्ट और मद्रास हाईकोर्ट के फैसलों को रद्द करते हुए पति को बरी कर दिया। साथ ही उसके खिलाफ दी गई सजा समाप्त कर दी गई और जब्त किया गया पासपोर्ट लौटाने का भी निर्देश दिया।

Case Details:

Case Title: Jayesh Kanna v. The Assistant Commissioner Law and Order (West) & Others

Case Number: Criminal Appeal Nos. 2382-2383 of 2026 (arising out of SLP (Crl.) Nos. 8581-8582 of 2026)

Bench: Justice J.K. Maheshwari and Justice Atul S. Chandurkar

Decision Date: May 7, 2026

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