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फीस न देने पर 13 साल की छात्रा को निकाला, बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा- शिक्षा से वंचित नहीं कर सकते

Vivek G.
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कु. चित्राक्षी योगेश रंगवानी एवं अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य। बॉम्बे हाईकोर्ट नागपुर बेंच ने फीस बकाया होने पर छात्रा को निकाले जाने का आदेश रद्द किया, कहा– शिक्षा का अधिकार सर्वोपरि है।

फीस न देने पर 13 साल की छात्रा को निकाला, बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा- शिक्षा से वंचित नहीं कर सकते

बॉम्बे हाईकोर्ट ने साफ कहा है कि केवल फीस बकाया होने के आधार पर 7वीं कक्षा की छात्रा को स्कूल से निकालना कानून के खिलाफ है। अदालत ने ट्रांसफर सर्टिफिकेट रद्द करते हुए छात्रा को फिर से स्कूल में दाखिला देने का आदेश दिया।

प्रस्तावना

नागपुर बेंच में सुनवाई के दौरान अदालत के सामने एक सीधा सवाल था-क्या 13 साल की बच्ची को सिर्फ इसलिए स्कूल से बाहर किया जा सकता है क्योंकि उसके पिता फीस समय पर जमा नहीं कर पाए?

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दोनों पक्षों की दलीलें लंबी चलीं, लेकिन अदालत ने अंततः शिक्षा के अधिकार को प्राथमिकता दी।

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मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता चितराक्षी रंगवानी, जो 7वीं कक्षा की छात्रा थीं, को स्कूल ने 27 मार्च 2025 को ट्रांसफर सर्टिफिकेट जारी कर दिया। कारण बताया गया-कक्षा 6 और 7 की कुल ₹23,900 फीस बकाया थी।

स्कूल प्रबंधन का कहना था कि कई नोटिस देने के बावजूद फीस जमा नहीं हुई। वहीं छात्रा के पिता ने आरोप लगाया कि स्कूल मनमानी फीस वसूल रहा था और उनके विरोध के बाद बच्ची को निशाना बनाया गया।

राज्य सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे में भी कहा गया कि नई शैक्षणिक सत्र शुरू हो चुका है और बच्ची अब तक किसी स्कूल में दाखिल नहीं हो सकी है।

स्कूल ने दलील दी कि वह एक अल्पसंख्यक, निजी और सीबीएसई से संबद्ध संस्था है। इसलिए उस पर शिक्षा का अधिकार कानून (RTE Act, 2009) लागू नहीं होता।

स्कूल के वकील ने कहा कि फीस न चुकाने पर ट्रांसफर सर्टिफिकेट देना प्रबंधन का अधिकार है।

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अदालत की टिप्पणी

खंडपीठ ने संविधान के अनुच्छेद 21-ए और शिक्षा के अधिकार अधिनियम, 2009 का हवाला देते हुए कहा कि 6 से 14 वर्ष के हर बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार है।

पीठ ने कहा,

“एक 13 साल की बच्ची को फीस न चुकाने के आधार पर शिक्षा से वंचित करना कानून की भावना के विपरीत है।”

अदालत ने यह भी नोट किया कि स्कूल ने पहले सरकार से अनुमति और मान्यता ली थी, जिसमें स्पष्ट शर्त थी कि प्राथमिक शिक्षा पूरी होने तक बच्चे को निकाला नहीं जा सकता।

पीठ ने टिप्पणी की,

“एक ओर स्कूल सरकारी शर्तों का लाभ लेता है और दूसरी ओर उन्हीं नियमों से बचने की कोशिश करता है। यह आचरण उचित नहीं कहा जा सकता।”

अदालत ने महाराष्ट्र शैक्षणिक संस्थान (फीस विनियमन) अधिनियम, 2011 की धारा 3A का भी उल्लेख किया। इसमें स्पष्ट है कि फीस देर से जमा होने पर स्कूल विलंब शुल्क या पेनल इंटरेस्ट ले सकता है, लेकिन छात्र को निष्कासित नहीं कर सकता।

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अंतिम फैसला

अदालत ने स्कूल द्वारा जारी ट्रांसफर सर्टिफिकेट को रद्द कर दिया।

आदेश में कहा गया:

• छात्रा को स्कूल से निकाला जाना अवैध है।

• याचिकाकर्ता दो सप्ताह के भीतर बकाया फीस जमा करेंगे।

• स्कूल किसी भी प्रकार का लेट फीस या पेनल इंटरेस्ट नहीं वसूलेगा।

इसी के साथ याचिका आंशिक रूप से स्वीकार कर ली गई और मामला समाप्त किया गया।

Case Title: Ku. Chitrakshi Yogesh Rangwani & Anr. vs State of Maharashtra & Ors.

Case No.: Writ Petition No. 3228 of 2025

Decision Date: 16 February 2026

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