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17 महीने की जेल, सुनवाई दूर: सुप्रीम कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में अरविंद धाम को दी राहत

Vivek G.
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17 महीने की जेल, सुनवाई दूर: सुप्रीम कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में अरविंद धाम को दी राहत

नई दिल्ली की सर्द सुबह, सुप्रीम कोर्ट की अदालत संख्या में खामोशी थी। लंबी बहस के बाद जैसे ही न्यायमूर्ति आलोक आराधे की पीठ ने आदेश पढ़ना शुरू किया, सबकी निगाहें एक ही नाम पर टिक गईं-अरविंद धाम। लगभग 17 महीने से जेल में बंद पूर्व उद्योगपति को आखिरकार राहत मिली। अदालत ने कहा कि लंबी कैद और ट्रायल में देरी, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले अधिकारों के खिलाफ है।

मामले की पृष्ठभूमि

अरविंद धाम, अमटेक ऑटो लिमिटेड के पूर्व प्रमोटर और नॉन-एग्जीक्यूटिव चेयरमैन रहे हैं। वर्ष 2017–18 में अमटेक ग्रुप की कंपनियां दिवालिया प्रक्रिया में गईं। इसके बाद आईडीबीआई बैंक और बैंक ऑफ महाराष्ट्र की शिकायतों पर एफआईआर दर्ज हुईं।

आरोप था कि सैकड़ों करोड़ रुपये के बैंक ऋण में धोखाधड़ी हुई। इन्हीं एफआईआर के आधार पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने मनी लॉन्ड्रिंग के मामले दर्ज किए और जुलाई 2024 में अरविंद धाम को गिरफ्तार किया गया।

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अदालत में बताया गया कि धाम ने गिरफ्तारी से पहले भी जांच में सहयोग किया। उनके घर पर तलाशी हुई, बयान दर्ज हुए और बाद में अभियोजन शिकायत दाखिल की गई।

हालांकि, कुल 28 आरोपियों में सिर्फ अरविंद धाम ही हिरासत में रहे। ईडी ने 200 से अधिक गवाहों की सूची दी, लेकिन अब तक न तो ट्रायल शुरू हुआ और न ही आरोपों पर औपचारिक संज्ञान लिया गया।

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अदालत की अहम टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट शब्दों में कहा कि लंबी कैद को सजा में नहीं बदला जा सकता।

पीठ ने कहा,

“अगर राज्य किसी आरोपी को समय पर सुनवाई का अधिकार नहीं दे सकता, तो केवल अपराध की गंभीरता के आधार पर जमानत का विरोध नहीं किया जा सकता।”

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अदालत ने यह भी जोड़ा कि आर्थिक अपराधों को एक ही तराजू में तौलना सही नहीं है। हर मामले के तथ्य अलग होते हैं।

गवाहों को प्रभावित करने और संपत्तियों के गलत तरीके से बेचे जाने के आरोपों पर भी कोर्ट ने संदेह जताया। पीठ ने कहा कि संबंधित गवाह को आरोपी के जेल जाने के बाद ही सूचीबद्ध किया गया, ऐसे में दबाव बनाने का आरोप “विश्वसनीय नहीं” लगता।

ट्रायल में देरी पर सवाल

कोर्ट ने रिकॉर्ड देखते हुए कहा कि ट्रायल में देरी के लिए आरोपी नहीं, बल्कि जांच एजेंसी जिम्मेदार रही। एक याचिका के कारण निचली अदालत की कार्यवाही महीनों तक रुकी रही।

न्यायालय ने माना कि इतने बड़े दस्तावेजी रिकॉर्ड और सैकड़ों गवाहों के बावजूद, निकट भविष्य में सुनवाई शुरू होने की कोई ठोस संभावना नहीं दिखती।

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सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सभी तथ्यों पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया।

अदालत ने निर्देश दिया कि अरविंद धाम को जमानत पर रिहा किया जाए। शर्तों के तहत उन्हें पासपोर्ट जमा करना होगा, भारत छोड़ने से पहले अनुमति लेनी होगी और जांच एजेंसी के संपर्क में रहना होगा।

इस तरह, 6 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने साफ संदेश दिया कि लंबी हिरासत और अनिश्चित ट्रायल, न्याय की कसौटी पर खरे नहीं उतरते।

Case Title: Arvind Dham vs Directorate of Enforcement

Case No.: Criminal Appeal (arising out of SLP (Crl.) No. 15478 of 2025)

Case Type: Criminal – Bail under PMLA

Decision Date: 6 January 2026

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