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17 साल पुराने संपत्ति विवाद में सुप्रीम कोर्ट का संतुलित फैसला, विशिष्ट निष्पादन से इनकार लेकिन ₹3 करोड़ रुपये देने का आदेश

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सुभाष अग्रवाल बनाम महेंद्र पाल छाबड़ा और अन्य - सुप्रीम कोर्ट ने 2008 के दिल्ली संपत्ति सौदे में विशिष्ट निष्पादन से इनकार कर दिया, उच्च न्यायालय के फैसले में संशोधन किया और विक्रेताओं को 3 करोड़ रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया।

17 साल पुराने संपत्ति विवाद में सुप्रीम कोर्ट का संतुलित फैसला, विशिष्ट निष्पादन से इनकार लेकिन ₹3 करोड़ रुपये देने का आदेश

करीब सत्रह साल पुराने एक संपत्ति विवाद में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को एक संतुलित और व्यावहारिक रुख अपनाते हुए फैसला सुनाया। अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश में आंशिक संशोधन किया, जिसमें खरीदार को विशिष्ट निष्पादन (Specific Performance) का लाभ देने से इनकार किया गया था। हालांकि, शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि विक्रेताओं को अनुचित लाभ नहीं मिलना चाहिए और इसी आधार पर खरीदार को 3 करोड़ रुपये का एकमुश्त भुगतान करने का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद दिल्ली के अशोक विहार फेज-1 स्थित 300 वर्ग गज के एक आवासीय प्लॉट से जुड़ा है। वर्ष 2008 में इस संपत्ति को 6.11 करोड़ रुपये में बेचने का समझौता हुआ था। खरीदार ने समझौते के दिन 60 लाख रुपये बतौर बयाना और बाद में 30 लाख रुपये अतिरिक्त भुगतान किए थे। कुल 90 लाख रुपये प्राप्त होने की बात विक्रेताओं ने भी स्वीकार की।

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समझौते के अनुसार, शेष राशि का भुगतान 10 मई 2008 तक किया जाना था। खरीदार ने आरोप लगाया कि विक्रेताओं ने अपनी जिम्मेदारियां पूरी नहीं कीं, जबकि विक्रेताओं का कहना था कि खरीदार तय समय पर भुगतान करने में सक्षम नहीं था।

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निचली अदालत और हाईकोर्ट के आदेश

ट्रायल कोर्ट ने 2021 में खरीदार के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि उसने अपनी “तत्परता और इच्छा” (readiness and willingness) साबित कर दी है और विक्रेताओं की ओर से चूक हुई है।

हालांकि, दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने बाद में इस डिक्री को पलट दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि खरीदार यह साबित नहीं कर सका कि उसके पास तय तारीख पर शेष 5.21 करोड़ रुपये चुकाने की वित्तीय क्षमता थी। अदालत ने यह भी नोट किया कि खरीदार उस दिन सब-रजिस्ट्रार कार्यालय भी नहीं पहुंचा। इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने 60 लाख रुपये का बयाना जब्त करने की अनुमति दी, जबकि 30 लाख रुपये ब्याज सहित लौटाने का निर्देश दिया।

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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां

अपील पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की अध्यक्षता वाली पीठ ने माना कि खरीदार अपनी तत्परता और भुगतान क्षमता साबित करने में असफल रहा। पीठ ने कहा,

“तत्परता और इच्छा का कोई तय फॉर्मूला नहीं हो सकता। यह हर मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।”

अदालत ने यह भी स्वीकार किया कि विक्रेताओं ने भी अपनी संविदात्मक जिम्मेदारियां पूरी नहीं कीं, विशेष रूप से संपत्ति के म्यूटेशन और लीजहोल्ड से फ्रीहोल्ड में परिवर्तन के संबंध में।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विशिष्ट निष्पादन एक न्यायसंगत राहत है और इतने लंबे समय बाद इसे देना उचित नहीं होगा। लेकिन साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि केवल बयाना जब्त करना विक्रेताओं के लिए “अनुचित लाभ” (unjust enrichment) बन सकता है।

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पीठ ने कहा कि न्याय का तकाजा यह है कि दोनों पक्षों को यथासंभव उनकी मूल स्थिति में लाया जाए, खासकर तब जब दोनों की ओर से चूक हुई हो।

अदालत का अंतिम फैसला

इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश में संशोधन किया और विक्रेताओं को निर्देश दिया कि वे चार सप्ताह के भीतर खरीदार को 3 करोड़ रुपये का एकमुश्त भुगतान करें। अदालत ने कहा कि इससे खरीदार की पर्याप्त भरपाई होगी और वर्षों से चले आ रहे इस विवाद का अंत होगा।

इसी के साथ अपील आंशिक रूप से स्वीकार कर ली गई और मामला समाप्त किया गया।

Case Title:- Subhash Aggarwal v. Mahender Pal Chhabra & Anr.

Case Number: Civil Appeal No. of 2026 (arising out of SLP (Civil) No. 30936 of 2025)

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