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19 साल बाद उच्च पद की मांग नामंजूर: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- अनुकंपा नियुक्ति स्वीकार करने के बाद अधिकार खत्म

Shivam
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तरुण गगत बनाम राकेश कुमार और अन्य - सुप्रीम कोर्ट ने 19 साल बाद उच्च अनुकंपा नियुक्ति की याचिका खारिज करते हुए कहा कि स्वीकृत पद से दावा समाप्त हो जाता है और 10,000 रुपये का जुर्माना लगाया।

19 साल बाद उच्च पद की मांग नामंजूर: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- अनुकंपा नियुक्ति स्वीकार करने के बाद अधिकार खत्म

सुप्रीम कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े एक पुराने विवाद पर सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि एक बार अनुकंपा आधार पर दी गई नौकरी स्वीकार कर लेने के बाद, वर्षों बाद उच्च पद की मांग नहीं की जा सकती। न्यायालय ने 19 साल बाद दायर की गई याचिका को खारिज करते हुए अपीलकर्ता पर ₹10,000 का जुर्माना भी लगाया ।

मामले की पृष्ठभूमि

मामले के अनुसार, अपीलकर्ता तरुण गगत के पिता का फरवरी 1999 में निधन हो गया था। इसके बाद उन्होंने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया। राज्य सरकार की तत्कालीन योजना के तहत उन्हें जून 1999 में ‘फॉरेस्ट गार्ड’ के पद पर नियुक्ति की पेशकश की गई, जिसे उन्होंने बिना किसी आपत्ति के स्वीकार कर लिया।

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हालांकि, नियुक्ति स्वीकार करने के करीब एक महीने बाद उन्होंने एक प्रतिनिधित्व देकर दावा किया कि उन्हें ‘फॉरेस्टर’ के पद पर नियुक्त किया जाना चाहिए था, क्योंकि यह पद उनके दिवंगत पिता के पद से एक वेतनमान नीचे आता था। इस दावे के समर्थन में उन्होंने वर्ष 1998 के एक स्पष्टीकरण परिपत्र का हवाला दिया।

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प्रशासनिक कार्यवाही

अपीलकर्ता की यह मांग अगस्त 1999 में प्रधान मुख्य वन संरक्षक द्वारा खारिज कर दी गई। इसके बाद उन्होंने वित्त आयुक्त के समक्ष वैधानिक अपील दायर की। रिकॉर्ड के अनुसार, इसके बाद लगभग 19 वर्षों तक उन्होंने कोई प्रभावी कानूनी कदम नहीं उठाया।

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वर्ष 2020 में एक अपीलीय आदेश के माध्यम से उनकी प्रारंभिक नियुक्ति को पूर्व प्रभाव से उच्च पद में परिवर्तित कर दिया गया। इस आदेश से विभाग के कई अन्य कर्मचारियों की वरिष्ठता प्रभावित हुई, जिसके चलते उन्होंने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का रुख किया।

हाईकोर्ट का दृष्टिकोण

हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने इस आदेश को रद्द करते हुए कहा कि अनुकंपा नियुक्ति स्वीकार करने के बाद, दो दशक से अधिक समय बीत जाने पर उसे उच्च पद में परिवर्तित नहीं किया जा सकता। बाद में, डिवीजन बेंच ने भी इस निर्णय को बरकरार रखा और इसे राज्य द्वारा शक्ति के मनमाने प्रयोग का उदाहरण बताया।

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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

अपील पर सुनवाई करते हुए जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने दोहराया कि अनुकंपा नियुक्ति कोई मौलिक या वैधानिक अधिकार नहीं है।

पीठ ने कहा,

“अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति चाहने वाला व्यक्ति किसी विशेष पद की मांग का अधिकार नहीं रखता।”

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल अपील या अभ्यावेदन दायर करने से पुराना और निष्क्रिय दावा जीवित नहीं रहता। लंबे समय तक चुप्पी साधे रखने के बाद अधिकार का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।

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साथ ही, अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि वर्षों बाद वरिष्ठता में बदलाव करने से अन्य कर्मचारियों के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जिन्हें बिना सुने लाभ नहीं छीना जा सकता।

अंतिम फैसला

सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपील को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया। अदालत ने अपीलकर्ता पर ₹10,000 का जुर्माना लगाया, जिसे आठ सप्ताह के भीतर हरियाणा के मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा करने का निर्देश दिया गया।

इसके साथ ही, मामला यहीं समाप्त हो गया ।

Case Title: Tarun Gagat v. Rakesh Kumar & Others

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