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498A का 'हथियार' नहीं बन सकता विवाह विवाद: बॉम्बे हाईकोर्ट ने पति व ससुराल वालों पर दर्ज FIR रद्द की

Vivek G.
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वैभव गोपालदास मुंदड़ा एवं अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य, बॉम्बे हाईकोर्ट नागपुर बेंच ने 498A केस में पति व ससुराल पक्ष पर दर्ज FIR रद्द की, कहा-सामान्य आरोपों पर आपराधिक कार्रवाई उचित नहीं।

498A का 'हथियार' नहीं बन सकता विवाह विवाद: बॉम्बे हाईकोर्ट ने पति व ससुराल वालों पर दर्ज FIR रद्द की

नागपुर बेंच में शुक्रवार को जब यह मामला पुकारा गया, कोर्ट रूम में सन्नाटा था। मामला था पति और उसके परिवार पर धारा 498A के तहत दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग का। सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति प्रवीण एस. पाटिल की एकल पीठ ने साफ शब्दों में कहा-यदि आरोप सामान्य और अस्पष्ट हों, तो आपराधिक कानून को वैवाहिक दबाव का साधन नहीं बनने दिया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

के अनुसार, मामला बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ के समक्ष आपराधिक आवेदन (APL) क्रमांक 1349/2024 के रूप में आया। आवेदक थे-पति वैभव मुंडडा, उनके माता-पिता और अन्य परिजन।

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पत्नी ने 1 जुलाई 2024 को पुलगांव पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई थी। आरोप था कि शादी (15 जून 2020) के बाद उसे मानसिक, आर्थिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया। उसने यह भी कहा कि उस पर गर्भपात के लिए दबाव बनाया गया और कमरे में छुपा कैमरा लगाया गया।

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दूसरी ओर, पति का कहना था कि दोनों के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा था। फरवरी 2024 में उसने खुद हिंजवाड़ी, पुणे में एनसीआर दर्ज कराई थी और मेडिकल रिपोर्ट में उसके शरीर पर चोटें भी दर्ज थीं। बाद में तलाक की याचिका दाखिल की गई।

समझौते की कोशिश और घटनाक्रम

कोर्ट में रिकॉर्ड से यह सामने आया कि मई 2024 में दोनों परिवारों के बीच आपसी समझौते की बातचीत हुई थी। 15 मई 2024 को एक लिखित सहमति बनी, जिसमें आपसी सहमति से अलग होने की बात तय हुई।

इसी सहमति के आधार पर पत्नी ने डॉक्टर की सलाह से गर्भपात कराया। अस्पताल का दस्तावेज और दोनों के हस्ताक्षर रिकॉर्ड पर रखे गए।

न्यायालय ने यह भी देखा कि व्हाट्सऐप चैट के प्रमाण पेश किए गए थे, जिनमें दोनों के बीच तनावपूर्ण संवाद थे।

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कोर्ट की अहम टिप्पणियाँ

सुनवाई के दौरान पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया, जिनमें कहा गया है कि धारा 498A का दुरुपयोग रोकना भी न्यायालय की जिम्मेदारी है।

पीठ ने कहा,

“न्यायालय मूकदर्शक नहीं रह सकता। उसे शिकायत के पीछे की परिस्थितियों को भी देखना होगा कि कहीं आपराधिक प्रक्रिया को दबाव या बदले के हथियार की तरह तो इस्तेमाल नहीं किया जा रहा।”

अदालत ने यह भी जोड़ा कि,

“धारा 498A का उद्देश्य गंभीर क्रूरता के मामलों में संरक्षण देना है। लेकिन सामान्य और व्यापक आरोप, जिनमें तारीख, समय और विशिष्ट घटनाएँ नहीं बताई गईं, उन्हें इस धारा के तहत स्वीकार नहीं किया जा सकता।”

छुपे कैमरे के आरोप पर कोर्ट ने पाया कि संबंधित अवधि में दंपत्ति पुणे में रह रहे थे, जिससे यह आरोप प्रथम दृष्टया कमजोर प्रतीत हुआ।

गर्भपात के मुद्दे पर भी न्यायालय ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सहमति पत्र और डॉक्टर का प्रमाणपत्र यह दिखाते हैं कि निर्णय आपसी सहमति से लिया गया था।

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न्यायालय का निर्णय

सभी तथ्यों और दस्तावेजों की जांच के बाद अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि शिकायत में लगाए गए आरोप सामान्य और अस्पष्ट हैं।

पीठ ने कहा कि आवेदकों द्वारा प्रस्तुत सामग्री “ठोस, विश्वसनीय और निर्विवाद” है, जो शिकायत में लगाए गए आरोपों को खारिज करती है।

अंत में अदालत ने आदेश दिया:

• आपराधिक आवेदन मंजूर किया जाता है।

• एफआईआर क्रमांक 580/2024, थाना पुलगांव, जिला वर्धा, धारा 498A सहपठित धारा 34 आईपीसी के तहत दर्ज मामला रद्द किया जाता है।

• नियम पूर्णतः स्वीकृत। कोई लागत नहीं।

Case Title: Vaibhav Gopaldas Mundada & Ors. vs State of Maharashtra & Anr.

Case No.: Criminal Application (APL) No. 1349 of 2024

Decision Date: 20 February 2026

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