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99 साल की लीज रद्द नहीं हो सकती: सुप्रीम कोर्ट ने विवेकानंद केंद्र के हक में हाईकोर्ट का फैसला पलटा

Vivek G.
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महासचिव, विवेकानंद केंद्र बनाम प्रदीप कुमार अग्रवाल और अन्य, सुप्रीम कोर्ट ने 99 साल की लीज रद्द करने पर बड़ा फैसला सुनाया। विवेकानंद केंद्र के पक्ष में हाईकोर्ट का आदेश पलटा।

99 साल की लीज रद्द नहीं हो सकती: सुप्रीम कोर्ट ने विवेकानंद केंद्र के हक में हाईकोर्ट का फैसला पलटा

नई दिल्ली में बुधवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया। मामला ओडिशा के बारिपदा स्थित एक संपत्ति से जुड़ा था, जहां 99 साल की लीज को एकतरफा रद्द कर दिया गया था। अदालत ने साफ कहा कि ऐसी लीज को बिना आपसी सहमति खत्म नहीं किया जा सकता।

इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा हाईकोर्ट के निर्णय को पलटते हुए ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत के आदेश को बहाल कर दिया।

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मामले की पृष्ठभूमि

विवाद बारिपदा टाउन के गोलापबाग इलाके की एक जमीन और भवन को लेकर था। यह संपत्ति मूल रूप से अनीमा बोस के नाम दर्ज थी।

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23 मार्च 1998 को अनीमा बोस ने इस संपत्ति को 99 साल के लिए विवेकानंद केंद्र के पक्ष में लीज पर दिया। वार्षिक किराया 1,000 रुपये तय किया गया। लीज का उद्देश्य केंद्र के आध्यात्मिक और सामाजिक कार्यों के लिए भवन का उपयोग था।

लेकिन 3 दिसंबर 2003 को अनीमा बोस ने एकतरफा तौर पर लीज रद्द कर दी और बाद में 2006 में इसी संपत्ति को तीसरे पक्ष को बेच दिया।

विवेकानंद केंद्र ने इसे चुनौती देते हुए सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया। ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत ने लीज को वैध माना और बिक्री को विवादित बताया। हालांकि, हाईकोर्ट ने इसे लाइसेंस मानते हुए केंद्र का दावा खारिज कर दिया।

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सुप्रीम कोर्ट के सामने असली सवाल यह था कि 23 मार्च 1998 का दस्तावेज “लीज” था या सिर्फ “लाइसेंस”?

लीज का मतलब है संपत्ति में कानूनी हित का हस्तांतरण, जबकि लाइसेंस केवल उपयोग की अनुमति देता है, मालिकाना हक नहीं।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान पीठ ने दस्तावेज की भाषा पर विशेष ध्यान दिया।

अदालत ने कहा कि किसी दस्तावेज का नाम निर्णायक नहीं होता, बल्कि उसके शब्द और आशय महत्वपूर्ण होते हैं।

पीठ ने कहा, “दस्तावेज को उसके साधारण और स्पष्ट शब्दों में पढ़ने पर यह स्पष्ट है कि यह 99 वर्ष की लीज है।”

अदालत ने यह भी जोड़ा, “जब तक दोनों पक्ष सहमत न हों, लीजधारी को उसकी अवधि तक संपत्ति से बेदखल नहीं किया जा सकता।”

कोर्ट ने पाया कि दस्तावेज में ‘डिमाइज’, ‘99 वर्ष’, ‘वार्षिक किराया’ और उत्तराधिकारियों तक अधिकार विस्तार जैसे शब्द थे, जो स्पष्ट रूप से लीज की ओर संकेत करते हैं।

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एकतरफा रद्दीकरण पर अदालत का रुख

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रजिस्टर्ड लीज को एकतरफा रद्द करने का कोई कानूनी आधार नहीं था।

पीठ ने स्पष्ट किया कि संपत्ति कानून के तहत लीज तभी समाप्त होती है जब कानूनी शर्तें पूरी हों या दोनों पक्ष सहमत हों। यहां ऐसा कुछ नहीं हुआ था।

हाईकोर्ट ने बाद की परिस्थितियों और गवाहों के बयानों के आधार पर दस्तावेज की व्याख्या की थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने असहमति जताई।

अदालत ने कहा, “जब दस्तावेज की भाषा स्पष्ट हो, तो बाद की घटनाओं के आधार पर उसकी मंशा तय करना उचित नहीं है।”

खरीदारों के अधिकार पर टिप्पणी

संपत्ति के खरीदारों ने खुद को bona fide purchaser (सद्भावनापूर्ण खरीदार) बताया था।

लेकिन रिकॉर्ड से यह सामने आया कि उन्हें 99 साल की लीज की जानकारी थी। इसलिए अदालत ने माना कि वे पहले से मौजूद अधिकारों के अधीन ही संपत्ति के हकदार होंगे।

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अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया।

ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत द्वारा विवेकानंद केंद्र के पक्ष में दिए गए आदेश को बहाल किया गया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि 99 साल की लीज वैध है और उसका एकतरफा रद्दीकरण अवैध था।

कोई लागत (cost) नहीं लगाई गई।

Case Title: The General Secretary, Vivekananda Kendra v. Pradeep Kumar Agarwalla & Others

Case No.: Civil Appeal No. of 2026 @ SLP (C) No. 9558 of 2023

Decision Date: February 26, 2026

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