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16 साल बाद झटका पलटा: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने बहाल किया खारिज वसूली मुकदमा, देरी माफ

Vivek G.
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मेसर्स राम कौर बिहारी लाल एंड कंपनी बनाम मेसर्स हाकम चंद एंड कंपनी एवं अन्य। जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने 16 साल पुराने वसूली मुकदमे को बहाल करते हुए 560 दिन की देरी माफ की, कहा-मामले मेरिट पर तय हों।

16 साल बाद झटका पलटा: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने बहाल किया खारिज वसूली मुकदमा, देरी माफ

जम्मू में एक पुराने कारोबारी विवाद पर शुक्रवार को बड़ा मोड़ आया। 16 साल तक चले मुकदमे को सिर्फ “गैर-हाजिरी” के आधार पर खारिज कर दिया गया था। लेकिन अब हाईकोर्ट ने उस आदेश को पलटते हुए मुकदमा फिर से बहाल कर दिया है। अदालत ने साफ कहा-न्याय का मकसद मामलों को तकनीकी कारणों से खत्म करना नहीं, बल्कि मेरिट पर तय करना है।

यह फैसला में दर्ज है।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला M/s Ram Kour Behari Lal and Co. बनाम M/s Hakam Chand and Co. एवं अन्य का है। वादी ने करीब 5.58 लाख रुपये की वसूली के लिए सिविल सूट दायर किया था।

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रिकॉर्ड बताता है कि दोनों पक्षों की गवाही पूरी हो चुकी थी और मामला अंतिम बहस के चरण में था। लेकिन मई 2011 में लगातार कुछ तारीखों पर वादी या उनके वकील की अनुपस्थिति के कारण ट्रायल कोर्ट ने मुकदमा “गैर-प्रोसीक्यूशन” यानी गैर-हाजिरी के आधार पर खारिज कर दिया।

करीब 560 दिन बाद वादी ने देरी माफी (condonation of delay) और मुकदमा बहाल करने की अर्जी दाखिल की। ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए अर्जी खारिज कर दी कि देरी के लिए पर्याप्त कारण नहीं बताया गया।

देरी की वजह क्या बताई गई?

वादी पक्ष ने दलील दी कि उनका केस एक वरिष्ठ वकील के चैंबर में चल रहा था। उसी दौरान उस चैंबर से जुड़े अधिवक्ता श्री रमन शर्मा अलग होकर स्वतंत्र प्रैक्टिस करने लगे।

फाइल प्रबंधन में हुई इस गड़बड़ी और वादी के स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण केस की ठीक से पैरवी नहीं हो सकी।

वादी के वकील ने अदालत में कहा, “मुकदमा 16 वर्षों से पूरी गंभीरता से लड़ा गया। जब बहस का समय आया, तभी यह दुर्भाग्यपूर्ण चूक हुई।”

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ट्रायल कोर्ट ने एक और तकनीकी आधार उठाया। अदालत ने कहा कि देरी माफी की अर्जी दाखिल करने वाले वकील की विधिवत वकालतनामा (पावर ऑफ अटॉर्नी) रिकॉर्ड पर नहीं थी।

इस आधार पर अदालत ने आवेदन को अस्वीकार कर दिया।

हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी

जस्टिस राजनेश ओसवाल और जस्टिस राहुल भारती की खंडपीठ ने ट्रायल कोर्ट के दृष्टिकोण से असहमति जताई।

पीठ ने कहा, “जब किसी मुकदमे में साक्ष्य पूरा हो चुका हो और मामला अंतिम बहस पर हो, तो उसे तकनीकी आधार पर खारिज करने की बजाय मेरिट पर तय किया जाना चाहिए।”

अदालत ने यह भी कहा कि यदि अदालत के रजिस्ट्रार कार्यालय ने वकालतनामा की कमी पर समय रहते ध्यान दिलाया होता, तो यह त्रुटि तुरंत सुधारी जा सकती थी।

पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए दोहराया-“Actus curiae neminem gravabit” यानी अदालत की गलती से किसी पक्ष को नुकसान नहीं होना चाहिए।

‘लिबरल अप्रोच’ की जरूरत

हाईकोर्ट ने माना कि 560 दिन की देरी लंबी जरूर है, लेकिन वादी का कारण “काल्पनिक या बनावटी” नहीं कहा जा सकता।

पीठ ने कहा, “16 साल तक मुकदमा लड़ने के बाद केवल देरी के आधार पर पक्षकार को न्याय से वंचित करना अन्यायपूर्ण होगा।”

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि यदि लापरवाही स्पष्ट न हो, तो न्याय-उन्मुख दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

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अदालत का फैसला

हाईकोर्ट ने 22.05.2023 का ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया।

देरी माफी की अर्जी स्वीकार की गई। मुकदमा बहाल कर दिया गया और उसे उसके मूल नंबर पर पुनर्स्थापित किया गया।

मामले को ट्रायल कोर्ट में मेरिट के आधार पर सुनवाई के लिए वापस भेजा गया। दोनों पक्षों को 02.03.2026 को संबंधित अदालत में पेश होने का निर्देश दिया गया।

Case Title: M/s Ram Kour Behari Lal and Co. vs. M/s Hakam Chand and Co. & Ors.

Case No.: RFA No. 29/2023

Decision Date: 06 February 2026

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