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9 साल की कानूनी लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, आयकर विभाग के कर्मचारियों को मिली नियमित नियुक्ति

Vivek G.
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पवन कुमार एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य, सुप्रीम कोर्ट ने आयकर विभाग के दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को 1 जुलाई 2006 से नियमित करने का आदेश दिया।

9 साल की कानूनी लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, आयकर विभाग के कर्मचारियों को मिली नियमित नियुक्ति

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक अहम फैसला सुनाते हुए आयकर विभाग, ग्वालियर में वर्षों से कार्यरत दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को बड़ी राहत दी। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि जब समान परिस्थितियों में काम कर रहे अन्य कर्मचारियों को नियमित किया जा चुका है, तो इन अपीलकर्ताओं के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने यह आदेश सुनाया।

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केस की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता - जिनमें पवन कुमार और अन्य शामिल हैं - 1993 से 1998 के बीच आयकर विभाग में कैजुअल या दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी के रूप में नियुक्त हुए थे। वे स्वीपर, कुक और अन्य पदों पर काम कर रहे थे।

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उन्होंने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT), जबलपुर और बाद में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। लेकिन दोनों जगह उन्हें यह कहकर राहत नहीं मिली कि वे Umadevi (2006) फैसले के तहत 10 अप्रैल 2006 तक 10 साल की निरंतर सेवा की शर्त पूरी नहीं करते।

इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

कोर्ट में क्या हुआ

सुनवाई के दौरान अपीलकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि ग्वालियर कार्यालय की 31 अक्टूबर 2005 की सूची (पेज 6) में उनके नाम उन कर्मचारियों के साथ दर्ज थे, जिन्हें बाद में सुप्रीम कोर्ट के Ravi Verma फैसले के आधार पर नियमित किया गया।

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उस सूची में पवन कुमार और अन्य अपीलकर्ताओं के नाम स्पष्ट रूप से दर्ज थे ।

वकील ने कहा, “जब एक ही सूची में शामिल कर्मचारियों को नियमित कर दिया गया, तो याचिकाकर्ताओं को अलग कैसे रखा जा सकता है?”

आयकर विभाग की ओर से कहा गया कि कोई स्वीकृत पद उपलब्ध नहीं था और अपीलकर्ता 10 साल की अनिवार्य सेवा की शर्त पूरी नहीं करते थे।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मामला अब केवल तकनीकी शर्तों का नहीं है।

कोर्ट ने Jaggo फैसले का हवाला देते हुए कहा, “लंबे समय तक लगातार और आवश्यक कार्य करने वाले कर्मचारियों को केवल प्रक्रिया की खामियों के आधार पर वंचित नहीं किया जा सकता।”

पीठ ने यह भी दोहराया कि Umadevi निर्णय का उद्देश्य “पिछले दरवाजे से की गई अवैध नियुक्तियों को रोकना था, न कि उन कर्मचारियों को सज़ा देना जिन्होंने वर्षों तक आवश्यक सेवाएं दी हैं।”

न्यायालय ने कहा, “जब समान परिस्थितियों में अन्य कर्मचारियों को नियमित किया गया है, तो वर्तमान अपीलकर्ताओं के साथ भेदभाव नहीं हो सकता।”

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भेदभाव का मुद्दा

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पहले Ravi Verma (2018) और बाद में Raman Kumar (2023) मामलों में इसी तरह के कर्मचारियों को नियमित करने का आदेश दिया जा चुका है।

पीठ ने कहा कि आयकर विभाग एक ही कार्यालय में काम करने वाले कर्मचारियों के साथ अलग-अलग व्यवहार नहीं कर सकता।

अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का 26 अगस्त 2019 का आदेश रद्द कर दिया।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि अपीलकर्ताओं की सेवाएं 1 जुलाई 2006 से नियमित की जाएं। उन्हें वही लाभ दिए जाएं जो Ravi Verma और Raman Kumar मामलों में दिए गए थे।

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साथ ही, सभी वित्तीय और सेवा संबंधी लाभ तीन महीने के भीतर जारी करने का आदेश दिया गया।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अंतरिम आवेदन में जो अन्य कर्मचारी पक्षकार बने थे, वे भी इस राहत के हकदार होंगे।

सिविल अपील स्वीकार करते हुए मामला समाप्त कर दिया गया।

Case Title: Pawan Kumar & Ors. vs Union of India & Ors.

Case No.: Civil Appeal arising out of SLP (C) No. 29214 of 2019

Decision Date: February 13, 2026

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