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किसान कल्याण योजना में देरी से दाखिल दावे खारिज करना गलत, कारण पर विचार जरूरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसान योजना में देरी से दाखिल दावा बिना कारण सुने खारिज नहीं किया जा सकता, और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत लागू होंगे।

किसान कल्याण योजना में देरी से दाखिल दावे खारिज करना गलत, कारण पर विचार जरूरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा कि केवल देरी के आधार पर दावा खारिज करना उचित नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दावेदार को देरी का कारण बताने का अवसर देना प्राकृतिक न्याय का हिस्सा है।

यह मामला कई याचिकाओं से जुड़ा था, जिनमें माला देवी, गायत्री देवी, सरस्वती देवी और शिव कुमारी ने अपने परिजनों की मृत्यु के बाद योजना के तहत मुआवजे का दावा किया था।

जिला स्तरीय समिति ने इन दावों को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि आवेदन योजना में निर्धारित 75 दिनों की समय सीमा के बाद किया गया था।

याचिकाकर्ताओं ने अदालत का रुख किया और कहा कि देरी के पीछे वास्तविक कारण थे, जैसे दस्तावेज़ जुटाने में समय लगना।

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डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन शामिल थे, ने कहा कि यह योजना एक कल्याणकारी (beneficial) योजना है, जिसका उद्देश्य गरीब किसानों के परिवारों को सहायता देना है।

कोर्ट ने कहा:

“किसी पात्र व्यक्ति को केवल तकनीकी आधार पर लाभ से वंचित करना, बिना उसे अपनी देरी का कारण बताने का मौका दिए, न्यायसंगत नहीं है।”

अदालत ने यह भी माना कि ग्रामीण और अशिक्षित परिवारों के लिए 75 दिन की सीमा व्यावहारिक रूप से कठोर हो सकती है।

“प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत (‘Audi Alteram Partem Rule’) यह मांग करता है कि किसी भी व्यक्ति को प्रभावित करने से पहले उसे सुना जाए।”

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि देरी माफी (condonation of delay) और समय सीमा बढ़ाना (extension of limitation) अलग-अलग अवधारणाएं हैं।

अदालत ने कहा कि:

• योजना में भले ही देरी माफ करने का स्पष्ट प्रावधान न हो,

• लेकिन प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत हर प्रशासनिक कार्य में लागू होते हैं

• “सफिशिएंट कॉज” (पर्याप्त कारण) होने पर देरी पर विचार किया जाना चाहिए

कोर्ट ने यह भी माना कि कई बार देरी सरकारी प्रक्रियाओं या दस्तावेज़ प्राप्त करने में लगने वाले समय के कारण होती है।

अदालत ने सभी याचिकाओं में जिला समिति के आदेशों को रद्द (set aside) कर दिया और निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता 30 दिनों के भीतर देरी का कारण बताते हुए अतिरिक्त हलफनामा दाखिल कर सकते हैं। इसके बाद संबंधित अधिकारी उस स्पष्टीकरण पर विचार करेंगे और आवश्यक होने पर सुनवाई का अवसर प्रदान करते हुए चार सप्ताह के भीतर कारणयुक्त आदेश पारित करेंगे।

Case Details

Case Title: Ashish Rawat & Ors. vs Union of India & Ors.

Case Number: Writ-C No. 1489 of 2026 and connected matters

Judges: Justice Ajit Kumar & Justice Swarupama Chaturvedi

Decision Date: 08 April 2026

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