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घरेलू हिंसा अधिनियम: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बकाया भरण-पोषण की वसूली की जांच की

Shivam
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इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत 2.64 लाख रुपये के भरण-पोषण बकाया की वसूली से संबंधित याचिका की समीक्षा की, जिसमें निष्पादन कार्यवाही और निचली अदालत की शक्तियों पर ध्यान केंद्रित किया गया। - हसीना खातून बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य

घरेलू हिंसा अधिनियम: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बकाया भरण-पोषण की वसूली की जांच की

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत दिए गए अंतरिम भरण-पोषण आदेश की वसूली से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि पहले से पारित और पुष्टि किए गए आदेशों में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला स्म्ट. हसीना खातून बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य से जुड़ा है।

आवेदिका (पत्नी) का विवाह वर्ष 1990 में हुआ था और एक पुत्र भी है, जो शारीरिक रूप से दिव्यांग है। पत्नी का आरोप था कि पति ने उसे और उसके पुत्र को घर से निकाल दिया और आर्थिक सहायता देना बंद कर दिया।

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इसके बाद, पत्नी ने घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के तहत आवेदन दायर किया। ट्रायल कोर्ट ने 19 जुलाई 2019 को आदेश देते हुए पति को ₹4,000 प्रति माह पत्नी और ₹4,000 पुत्र को देने का निर्देश दिया।

पति ने इस आदेश को चुनौती दी, लेकिन:

• सेशंस कोर्ट ने 1 अप्रैल 2022 को अपील खारिज कर दी

• इसके बाद हाईकोर्ट ने भी 2 नवंबर 2022 को हस्तक्षेप से इनकार किया

इस प्रकार, भरण-पोषण का आदेश अंतिम रूप से कायम रहा।

बाद में, पत्नी ने ₹2,64,000 की बकाया राशि (33 महीने × ₹8,000) की वसूली के लिए आवेदन दिया। अदालत ने रिकवरी वारंट जारी किया और पति को जेल भी भेजा गया।

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पत्नी ने एक और आवेदन देकर बकाया राशि की वसूली के लिए आगे की कार्यवाही की मांग की। हालांकि, निचली अदालत ने उसकी मांग को आंशिक रूप से अस्वीकार कर दिया, जिसके खिलाफ यह याचिका हाईकोर्ट में दायर की गई।

न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरी ने सुनवाई के दौरान कहा कि:

“जब निचली अदालत द्वारा तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर आदेश पारित किया गया हो, और उसमें कोई स्पष्ट त्रुटि न हो, तो उच्च न्यायालय को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।”

अदालत ने यह भी माना कि पहले ही तीन स्तरों पर (ट्रायल कोर्ट, अपीलीय कोर्ट और हाईकोर्ट) भरण-पोषण आदेश की पुष्टि हो चुकी है।

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साथ ही, न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के स्थापित सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि पुनरीक्षण या धारा 482 के तहत हस्तक्षेप सीमित परिस्थितियों में ही संभव है।

हाईकोर्ट ने आवेदिका की धारा 482 CrPC के तहत दाखिल याचिका को खारिज कर दिया।

अदालत ने यह माना कि:

• निचली अदालत के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है

• पहले से पुष्टि किए गए आदेश में हस्तक्षेप का कोई औचित्य नहीं बनता

इस प्रकार, पत्नी की याचिका अस्वीकार कर दी गई।

Case Details

Case Title: Hasina Khatoon vs State of U.P. and Another

Case Number: Application U/s 482 No. 7721 of 2023

Judge: Hon’ble Justice Praveen Kumar Giri

Decision Date: 24 March 2026

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