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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने PITNDPS निरोध आदेश को बताया गैर-कानूनी, तत्काल रिहाई का आदेश

Shivam
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने PITNDPS के तहत पारित निरोध आदेश को अवैध बताते हुए रद्द किया और कहा कि बिना ठोस आधार हिरासत संविधान के विरुद्ध है। - अमित सिंह बनाम भारत संघ और अन्य

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने PITNDPS निरोध आदेश को बताया गैर-कानूनी, तत्काल रिहाई का आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में केंद्र सरकार द्वारा पारित निरोध आदेश को रद्द करते हुए कहा कि बिना ठोस कारण और उचित प्रक्रिया के किसी व्यक्ति को हिरासत में रखना संविधान के खिलाफ है। अदालत ने याचिकाकर्ता अमित सिंह की हिरासत को अवैध मानते हुए तुरंत रिहा करने का आदेश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला हैबियस कॉर्पस याचिका से जुड़ा था, जिसमें याचिकाकर्ता अमित सिंह ने 8 अगस्त 2025 और 6 नवंबर 2025 के निरोध आदेशों को चुनौती दी थी। ये आदेश PITNDPS Act, 1988 के तहत पारित किए गए थे।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि:

• निरोध के आधार समय पर नहीं बताए गए

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• जरूरी दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए

• आदेश केवल आशंकाओं पर आधारित थे, न कि ठोस साक्ष्यों पर

अदालत के समक्ष यह भी रखा गया कि याचिकाकर्ता पहले से ही न्यायिक हिरासत में था, फिर भी उसके खिलाफ निरोध आदेश जारी किया गया।

न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि निरोध आदेश पारित करते समय अधिकारियों ने “दिमाग का उपयोग” नहीं किया।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि:

• यदि व्यक्ति पहले से जेल में है, तो निरोध आदेश तभी वैध होगा जब उसके रिहा होने की वास्तविक संभावना और भविष्य में अपराध की आशंका का ठोस आधार हो

• केवल अनुमान या सामान्य कथन पर्याप्त नहीं हैं

पीठ ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा,

“निरोध आदेशों में कहीं भी ‘grounds of detention’ का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। यह दर्शाता है कि आदेश बिना उचित विचार के पारित किए गए हैं।”

अदालत ने यह भी कहा कि केवल कागजी संतुष्टि (mechanical satisfaction) कानून की आवश्यकताओं को पूरा नहीं करती।

अदालत ने पाया कि:

• निरोध आदेश में आवश्यक कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं हुआ

• आदेश “मनमाना और गैर-कानूनी” था

• अधिकारियों ने संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 22 का उल्लंघन किया

पीठ ने यह भी कहा कि ऐसे आदेश न्याय प्रणाली के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जा सकती है।

अदालत ने 8 अगस्त 2025 और 6 नवंबर 2025 के दोनों निरोध आदेशों को रद्द कर दिया और निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को तत्काल रिहा किया जाए।

Case Details

Case Title: Amit Singh vs Union of India & Others

Case Number: Habeas Corpus Writ Petition No. 128 of 2026

Judges: Justice Siddharth and Justice Vinai Kumar Dwivedi

Decision Date: April 15, 2026

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