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सिर्फ रजिस्टर्ड वकील ही कर सकते हैं कोर्ट में बहस: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गैर-वकील की पैरवी की मांग ठुकराई

Shivam
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सिर्फ रजिस्टर्ड वकील ही कर सकते हैं कोर्ट में बहस: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गैर-वकील की पैरवी की मांग ठुकराई

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कानूनी पेशे से जुड़े नियमों को स्पष्ट करते हुए कहा है कि केवल वही व्यक्ति अदालत में पेश होकर बहस कर सकता है जो विधिवत अधिवक्ता (एडवोकेट) के रूप में पंजीकृत हो। यह फैसला एक ऐसे व्यक्ति की याचिका खारिज करते हुए दिया गया, जो पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर दूसरों के मामलों में बहस करना चाहता था।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता ने दावा किया कि वह बिना वकील के रूप में पंजीकरण के भी ट्रायल कोर्ट में लोगों की ओर से पेश होता रहा है। 2019 में कानपुर की एक अदालत ने उसे एक मामले में वकील के रूप में नियुक्त करने से इनकार कर दिया था।

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इसके बाद उसने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और तर्क दिया कि पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर वह “मुख्तियार” या “प्लीडर” के रूप में पेश हो सकता है। उसने अपने पक्ष में संविधान और सिविल प्रक्रिया संहिता की कुछ धाराओं का हवाला भी दिया।

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जस्टिस विनोद दिवाकर की पीठ ने कहा कि अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 29 और 33 के अनुसार केवल नामांकित अधिवक्ताओं को ही वकालत करने का अधिकार है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया,

“कानून की प्रैक्टिस का अधिकार केवल अधिवक्ताओं तक सीमित है।”

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हालांकि अदालत ने यह भी माना कि विशेष परिस्थितियों में, अदालत की अनुमति से कोई व्यक्ति सीमित उद्देश्य के लिए किसी का प्रतिनिधित्व कर सकता है, लेकिन यह उसका अधिकार नहीं बल्कि अदालत का विवेकाधीन निर्णय है।

पीठ ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा,

“कानून की अधूरी जानकारी खुद के लिए ही नहीं, बल्कि जिनका वह प्रतिनिधित्व करता है, उनके लिए भी नुकसानदेह है और इससे न्याय की हानि होती है।”

अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि कोई भी गैर-पंजीकृत व्यक्ति केवल पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर दूसरों की ओर से अदालत में बहस करने का अधिकार नहीं रखता।

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