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फर्जी 12वीं प्रमाणपत्र से वकालत का आरोप: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अधिवक्ता की जमानत खारिज की

Vivek G.
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आशीष शुक्ला बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फर्जी 12वीं प्रमाणपत्र के आरोप में अधिवक्ता की जमानत खारिज की, कहा-कानूनी पेशे में ईमानदारी सर्वोपरि।

फर्जी 12वीं प्रमाणपत्र से वकालत का आरोप: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अधिवक्ता की जमानत खारिज की

इलाहाबाद उच्च न्यायालय में बुधवार को एक दिलचस्प और गंभीर मामला सुनवाई के लिए आया। एक प्रैक्टिस कर रहे अधिवक्ता पर आरोप है कि उन्होंने फर्जी शैक्षिक प्रमाणपत्रों के आधार पर एलएलबी की डिग्री हासिल की और बार काउंसिल में पंजीकरण कराया। अदालत ने लंबी बहस सुनने के बाद उनकी जमानत अर्जी खारिज कर दी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला कानपुर नगर के कोतवाली थाने में दर्ज केस क्राइम संख्या 89/2025 से जुड़ा है। आरोप है कि अधिवक्ता ने 12वीं की परीक्षा पास न करने के बावजूद फर्जी दस्तावेजों के आधार पर आगे की पढ़ाई की और खुद को अधिवक्ता के रूप में पंजीकृत कराया।

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शिकायतकर्ता, जो खुद एक अधिवक्ता हैं, ने कानपुर बार एसोसिएशन के अध्यक्ष को शपथपत्र के साथ शिकायत दी थी। इसके बाद पुलिस में एफआईआर दर्ज हुई। आरोप भारतीय दंड संहिता की धाराएं 420 (धोखाधड़ी), 467, 468 और 471 (जालसाजी और जाली दस्तावेज का इस्तेमाल) के तहत लगाए गए।

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बचाव पक्ष की दलीलें

अभियुक्त की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि शिकायत व्यक्तिगत द्वेष का परिणाम है। उन्होंने कहा कि 12वीं के प्रमाणपत्र “दीमक द्वारा नष्ट” हो गए थे, इसलिए उन्हें पेश नहीं किया जा सका।

बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि अभियुक्त पहले ही अग्रिम जमानत पर थे, लेकिन उसे निरस्त कर दिया गया। गिरफ्तारी को “मनमाना” और “अवैध” बताया गया।

अदालत में यह भी कहा गया कि अभियुक्त के खिलाफ जो आपराधिक इतिहास दिखाया गया है, उसमें अधिकतर मामलों में वे बरी हो चुके हैं।

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अभियोजन और राज्य का पक्ष

राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने अदालत को बोर्ड कार्यालय की रिपोर्ट दिखाई। रिपोर्ट के अनुसार अभियुक्त वर्ष 1994 में इंटरमीडिएट परीक्षा में असफल हुए थे।

अभियोजन ने जोर देकर कहा कि “दीमक द्वारा सिर्फ 12वीं का प्रमाणपत्र नष्ट हो जाना, जबकि बाकी दस्तावेज सुरक्षित रहना, सामान्य बात नहीं है।”

अदालत में यह भी बताया गया कि अभियुक्त ने अलग-अलग फॉर्म में खुद को 12वीं पास बताया और उसी आधार पर स्नातक व एलएलबी की पढ़ाई की।

अदालत की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने कड़ी टिप्पणी की। उन्होंने कहा,

“एक अधिवक्ता केवल पेशेवर व्यक्ति नहीं, बल्कि न्यायालय का अधिकारी होता है। यदि वही व्यक्ति अपने प्रवेश के लिए फर्जी दस्तावेजों का सहारा ले, तो यह न्याय व्यवस्था की जड़ों पर चोट है।”

अदालत ने संस्कृत श्लोक का उल्लेख करते हुए कहा -“आचारः परमो धर्मः - अर्थात् आचरण ही सर्वोच्च धर्म है।”

पीठ ने स्पष्ट कहा कि इस स्तर पर प्रस्तुत सामग्री प्रथम दृष्टया गंभीर आरोप स्थापित करती है।

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अदालत का फैसला

अदालत ने माना कि अभियुक्त की ओर से दी गई “दीमक” वाली सफाई विश्वसनीय नहीं है। बोर्ड की रिपोर्ट से यह संकेत मिलता है कि वे इंटरमीडिएट में असफल थे।

कोर्ट ने यह भी कहा कि अग्रिम जमानत की शर्तों का पालन नहीं किया गया। ऐसे में यह मामला जमानत के लिए उपयुक्त नहीं है।

न्यायालय ने आदेश में कहा,“उपरोक्त तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए यह जमानत देने का उपयुक्त मामला नहीं है।”

इसी के साथ जमानत अर्जी खारिज कर दी गई। हालांकि, अदालत ने निचली अदालत को निर्देश दिया कि मुकदमे की सुनवाई यथाशीघ्र पूरी की जाए।

Case Title: Ashish Shukla vs State of U.P.

Case No.: Criminal Misc. Bail Application No. 3312 of 2026

Decision Date: 06 February 2026

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