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इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि पत्नी का रोजगार भरण-पोषण राशि कम करने का आधार नहीं है।

Shivam
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रविंदर सिंह बिष्ट बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य - इलाहाबाद उच्च न्यायालय का कहना है कि कामकाजी पत्नी की आय अकेले भरण-पोषण से इनकार करने का आधार नहीं बन सकती, रविंदर सिंह बिष्ट मामले में ₹15,000 मासिक सहायता राशि को बरकरार रखा गया है।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि पत्नी का रोजगार भरण-पोषण राशि कम करने का आधार नहीं है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम आदेश में पति की आपत्ति खारिज करते हुए पत्नी को दिए गए ₹15,000 प्रति माह भरण-पोषण के आदेश को कायम रखा। अदालत ने साफ कहा कि सिर्फ यह तर्क कि पत्नी नौकरी करती है, अपने आप में भरण-पोषण से इनकार का आधार नहीं बनता। यह फैसला रविंदर सिंह बिष्ट बनाम राज्य व अन्य मामले में आया, जहां फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

पत्नी ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की मांग की थी। फैमिली कोर्ट, गाजियाबाद ने 4 जनवरी 2025 को पति को आवेदन की तारीख से ₹15,000 प्रति माह देने का निर्देश दिया। पति ने हाईकोर्ट में कहा कि पत्नी पढ़ी-लिखी और कमाने वाली है, इसलिए वह भरण-पोषण की हकदार नहीं।

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इसके समर्थन में आयकर दस्तावेज दिखाए गए। दूसरी ओर, पत्नी ने कहा कि पति ने अपनी वास्तविक आय नहीं बताई और पहले एक बड़ी कंपनी में उच्च पैकेज पर काम कर चुका है।

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अदालत की टिप्पणी

न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह ने रिकॉर्ड देखकर कहा कि “सिर्फ पत्नी का नौकरी करना, भरण-पोषण से वंचित करने का आधार नहीं हो सकता।” कोर्ट ने यह भी नोट किया कि दोनों की आय और जीवन-स्तर में बड़ा अंतर दिखता है। आदेश में कहा गया कि धारा 125 का उद्देश्य केवल भुखमरी से बचाना नहीं, बल्कि पत्नी को पति की हैसियत के मुताबिक सम्मानजनक जीवन देना है।

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अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए जोड़ा कि असली कसौटी यह है कि क्या पत्नी की आय उसे वैसा जीवन जीने देती है जैसा वह वैवाहिक जीवन में जीती थी।

फैसला

हाईकोर्ट ने पाया कि पति अपनी आय में कमी का ठोस सबूत नहीं दे सका और उसकी आर्थिक दलीलें केवल बयान भर रहीं। इसलिए फैमिली कोर्ट का आदेश “उचित और वाजिब” माना गया।

अंततः अदालत ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी और ₹15,000 प्रति माह भरण-पोषण का आदेश बरकरार रखा।

Case Name: Ravinder Singh Bisht vs State of Uttar Pradesh & Another

Case Number: Criminal Revision No. 1637 of 2025

Date of Decision: 5 February 2026

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