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'छोटी-मोटी विसंगतियों से परिवार के भरोसेमंद गवाहों की विश्वसनीयता कम नहीं होती': इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हत्या के मामले में उम्रकैद की सज़ा बरकरार रखी।

Zaved Khan
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रणजीत पटेल की हत्या मामले में उम्रकैद की सजा बरकरार रखते हुए कहा कि पारिवारिक गवाहों के बयानों में मामूली विरोधाभास विश्वसनीय साक्ष्य को कमजोर नहीं करते। - Ranjeet Patel v. State of U.P.

'छोटी-मोटी विसंगतियों से परिवार के भरोसेमंद गवाहों की विश्वसनीयता कम नहीं होती': इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हत्या के मामले में उम्रकैद की सज़ा बरकरार रखी।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जौनपुर के बहुचर्चित हत्या मामले में दोषी रणजीत पटेल की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखते हुए कहा है कि यदि प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के बयान मूल घटनाक्रम पर एक समान हों, तो उनमें मौजूद छोटे-मोटे विरोधाभास अभियोजन के पूरे मामले को कमजोर नहीं करते। न्यायालय ने पाया कि परिवार के सदस्यों के बयान चिकित्सा साक्ष्यों से मेल खाते हैं और उन पर विश्वास किया जा सकता है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 28 मार्च 2019 को सत्र न्यायाधीश, जौनपुर द्वारा दिए गए उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें रणजीत पटेल को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास और ₹10,000 के जुर्माने की सजा सुनाई गई थी।

अभियोजन के अनुसार, 26 मई 2015 की सुबह लगभग 3:30 बजे जौनपुर के लखमीपुर गांव में पैसों के लेन-देन को लेकर विवाद हुआ। आरोप था कि रणजीत पटेल ने अपने चचेरे भाई राम आसरे को गालियां दीं और फिर लोहे के हथियार से उसके सिर पर वार कर दिया। गंभीर रूप से घायल राम आसरे को उपचार के लिए बीएचयू अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। इसके बाद आरोपी के खिलाफ धारा 302 और 504 आईपीसी के तहत एफआईआर दर्ज की गई।

सत्र न्यायालय ने सुनवाई के बाद आरोपी को धारा 504 आईपीसी से बरी कर दिया, लेकिन हत्या के अपराध में दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। इसी फैसले को चुनौती देते हुए रणजीत पटेल ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।

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अपीलकर्ता और राज्य की दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से कहा गया कि अभियोजन के सभी प्रत्यक्षदर्शी मृतक के परिवार के सदस्य हैं, इसलिए वे पक्षपाती हैं। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि गवाहों के बयानों में अस्पताल और थाने जाने के क्रम, हत्या में प्रयुक्त हथियार तथा चोटों के स्वरूप को लेकर विरोधाभास हैं, जिन्हें ट्रायल कोर्ट ने नजरअंदाज कर दिया।

वहीं राज्य सरकार ने दलील दी कि आरोपी का नाम शुरुआत से ही एफआईआर में दर्ज था और सभी प्रत्यक्षदर्शियों ने घटना के मुख्य तथ्यों का एक जैसा विवरण दिया है। राज्य के अनुसार, बताए गए विरोधाभास मामूली हैं और उनसे अभियोजन की कहानी प्रभावित नहीं होती।

हाईकोर्ट की टिप्पणी

डिवीजन बेंच ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा के बाद कहा कि गवाहों के बयानों में जो अंतर दिखाई देता है, वह केवल घटना के बाद की परिस्थितियों से जुड़ा है, न कि हत्या की वास्तविक घटना से।

पीठ ने कहा,

"गवाह के बयान में जो विरोधाभास हैं, वे बेहद मामूली हैं और अभियोजन की कहानी या उसके साक्ष्य के महत्व को प्रभावित नहीं करते।"

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर किसी गवाह की गवाही को अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि वह मृतक का रिश्तेदार है। न्यायालय ने कहा कि पारिवारिक गवाहों की गवाही का सावधानी से परीक्षण किया जाना चाहिए, लेकिन यदि वह स्वाभाविक, विश्वसनीय और अन्य साक्ष्यों से पुष्ट हो, तो उस पर भरोसा किया जा सकता है।

पीठ ने इस तथ्य को भी महत्वपूर्ण माना कि एफआईआर में केवल रणजीत पटेल का ही नाम आरोपी के रूप में दर्ज किया गया था, जबकि दोनों पक्षों के कई अन्य पारिवारिक सदस्य एक ही परिसर में रहते थे। अदालत के अनुसार, यदि झूठा फंसाने की मंशा होती तो अन्य लोगों को भी आरोपी बनाया जा सकता था।

हत्या में प्रयुक्त हथियार को लेकर अदालत ने कहा कि 'लोहे की रॉड' और 'रांभा (सब्बल)' के वर्णन में कोई ऐसा महत्वपूर्ण अंतर नहीं है जिससे अभियोजन की कहानी पर संदेह किया जाए। दोनों ही लोहे के बने ऐसे औजार हैं जिनसे पोस्टमार्टम रिपोर्ट में वर्णित गंभीर सिर की चोट पहुंचाई जा सकती है।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतक की बाईं टेम्पोरल हड्डी (सिर के बाएं हिस्से) में फ्रैक्चर और सिर में गंभीर चोट का उल्लेख है, जो प्रत्यक्षदर्शियों के बयान से मेल खाता है।

घटना तड़के हुई होने के बावजूद पहचान पर उठाए गए सवाल को भी अदालत ने खारिज कर दिया। न्यायालय ने कहा कि आरोपी मृतक और गवाहों का करीबी रिश्तेदार था तथा सभी एक ही साझा परिसर में रहते थे। ऐसी स्थिति में गवाह उसे आवाज, चाल-ढाल और चेहरे से आसानी से पहचान सकते थे।

अदालत का फैसला

सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट के निर्णय में कोई अवैधता, त्रुटि या विकृति नहीं है। इसलिए अदालत ने रणजीत पटेल की आपराधिक अपील खारिज करते हुए हत्या के मामले में उसकी दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा। साथ ही निचली अदालत को आदेश की प्रति भेजने और अभिलेख वापस प्रेषित करने का निर्देश दिया।

Case Details:

Case Title: Ranjeet Patel v. State of U.P.

Case Number: Criminal Appeal No. 4487 of 2019

Judge: Justice J.J. Munir and Justice Vinai Kumar Dwivedi

Decision Date: July 1, 2026

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