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इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला: उत्तराधिकार प्रमाणपत्र के लिए हर मामले में सुरक्षा बॉन्ड जरूरी नहीं

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि उत्तराधिकार प्रमाणपत्र देते समय हर मामले में सुरक्षा या जमानती बॉन्ड की शर्त लगाना आवश्यक नहीं है। यदि अन्य उत्तराधिकारियों को कोई आपत्ति नहीं है, तो अदालत अपने विवेक से इस शर्त से छूट दे सकती है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला: उत्तराधिकार प्रमाणपत्र के लिए हर मामले में सुरक्षा बॉन्ड जरूरी नहीं

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तराधिकार प्रमाणपत्र (Succession Certificate) से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा है कि हर मामले में सुरक्षा बॉन्ड (Security Bond) की शर्त लगाना अनिवार्य नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि मृतक के अन्य वारिसों को कोई आपत्ति नहीं है और कोई अन्य दावेदार सामने नहीं है, तो अदालत परिस्थितियों के आधार पर इस शर्त से छूट दे सकती है।

यह फैसला न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम की पीठ ने अल्का सिंघानिया बनाम शिल्पी अग्रवाल मामले में सुनाया।

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अदालत ने निचली अदालत के आदेश में संशोधन करते हुए याचिकाकर्ता को सुरक्षा बॉन्ड जमा करने की शर्त से छूट दे दी और निर्देश दिया कि आठ सप्ताह के भीतर उत्तराधिकार प्रमाणपत्र जारी किया जाए।

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मामले के अनुसार, शकुंतला देवी का 30 अक्टूबर 2008 को निधन हो गया था। उनके पीछे दो बेटियां — अल्का सिंघानिया (याचिकाकर्ता) और शिल्पी अग्रवाल (प्रतिवादी) — ही कानूनी वारिस के रूप में बचीं।

शकुंतला देवी के नाम पर Reliance Industries Limited के शेयर थे। संपत्ति के हस्तांतरण के लिए अल्का सिंघानिया ने भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 372 के तहत कानपुर नगर की सिविल अदालत में उत्तराधिकार प्रमाणपत्र जारी करने की याचिका दायर की।

नोटिस और समाचार पत्रों में प्रकाशन के बाद किसी अन्य व्यक्ति ने दावा या आपत्ति दर्ज नहीं कराई। साथ ही प्रतिवादी शिल्पी अग्रवाल ने भी शपथपत्र देकर कहा कि उन्हें अपनी बहन को उत्तराधिकार प्रमाणपत्र जारी किए जाने पर कोई आपत्ति नहीं है।

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हालांकि, सिविल जज (सीनियर डिवीजन) कानपुर नगर ने 18 जनवरी 2025 के आदेश में उत्तराधिकार प्रमाणपत्र जारी करने की अनुमति देते हुए याचिकाकर्ता को समान राशि का सुरक्षा बॉन्ड और व्यक्तिगत बॉन्ड जमा करने की शर्त लगा दी।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि जब मृतक के केवल दो ही वारिस हैं और दूसरी वारिस ने भी स्पष्ट रूप से कोई आपत्ति नहीं जताई है, तो सुरक्षा बॉन्ड की शर्त लगाना अनुचित और अनावश्यक है।

वहीं प्रतिवादी शिल्पी अग्रवाल ने भी अदालत में दाखिल अपने हलफनामे में कहा कि उन्हें उत्तराधिकार प्रमाणपत्र याचिकाकर्ता को दिए जाने पर कोई आपत्ति नहीं है।

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याचिकाकर्ता के वकील ने इस संदर्भ में **दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले Arvind Nanda vs State (2020) ** का भी हवाला दिया।

हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 375 के तहत सुरक्षा या जमानती बॉन्ड लगाने का उद्देश्य उन संभावित दावेदारों के हितों की रक्षा करना है जो संपत्ति पर दावा कर सकते हैं।

लेकिन अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह शर्त हर मामले में स्वतः लागू नहीं की जा सकती।

अदालत ने कहा:

“उत्तराधिकार प्रमाणपत्र के मामलों में सुरक्षा या जमानती बॉन्ड लगाने का निर्णय अदालत के विवेक पर निर्भर करता है और इसे हर मामले में यांत्रिक तरीके से लागू नहीं किया जाना चाहिए।”

मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश में संशोधन करते हुए याचिकाकर्ता को सुरक्षा बॉन्ड जमा करने की शर्त से छूट दे दी।

साथ ही अदालत ने निचली अदालत को निर्देश दिया कि आठ सप्ताह के भीतर उत्तराधिकार प्रमाणपत्र जारी किया जाए।

इसके साथ ही याचिका को स्वीकार करते हुए मामला निस्तारित कर दिया गया।

Case Details

Case Title: Smt. Alka Singhania vs Smt. Shilpi Agarwal

Court: Allahabad High Court

Judge: Justice Manish Kumar Nigam

Decision Date: 13 March 2026

Case Number: Matters Under Article 227 No. 8772 of 2025

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