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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने GST गिरफ्तारी पर कड़ा रुख अपनाया, जय कुमार अग्रवाल की हिरासत अवैध करार

Vivek G.
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जय कुमार अग्रवाल बनाम जीएसटी इंटेलिजेंस महानिदेशालय और अन्य, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जीएसटी गिरफ्तारी मामले में जय कुमार अग्रवाल की हिरासत अवैध ठहराई, रिमांड आदेश रद्द कर रिहाई का आदेश दिया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने GST गिरफ्तारी पर कड़ा रुख अपनाया, जय कुमार अग्रवाल की हिरासत अवैध करार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में जीएसटी कानून के तहत की गई गिरफ्तारी और रिमांड को अवैध ठहराते हुए याची जय कुमार अग्रवाल की रिहाई का आदेश दिया है। अदालत ने साफ कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा मामला होने पर प्रक्रिया का अक्षरशः पालन जरूरी है।

मामले की पृष्ठभूमि

जय कुमार अग्रवाल को 29 दिसंबर 2025 को उनके घर पर जीएसटी विभाग की टीम ने तलाशी के दौरान हिरासत में लिया। बाद में 16 जनवरी 2026 को उन्हें केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम, 2017 की धारा 69 के तहत गिरफ्तार किया गया।

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याची की ओर से दलील दी गई कि गिरफ्तारी के समय उन्हें न तो “गिरफ्तारी के आधार” (grounds of arrest) लिखित रूप में दिए गए और न ही “reason to believe” की प्रति सौंपी गई। यह भी कहा गया कि मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने से पहले आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए।

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याची की दलील

वरिष्ठ अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले Radhika Agrawal का हवाला देते हुए कहा कि गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में देना अनिवार्य है।

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि अपराध अधिकतम पांच वर्ष तक की सजा वाला है, ऐसे में Satendra Kumar Antil के फैसले के अनुसार गिरफ्तारी अंतिम विकल्प होनी चाहिए थी।

अदालत को बताया गया कि गिरफ्तारी मेमो में किसी संलग्नक (annexure) का उल्लेख नहीं था, जबकि विभागीय परिपत्र में स्पष्ट निर्देश है कि “गिरफ्तारी के आधार” लिखित रूप में संलग्न किए जाएं।

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विभाग का पक्ष

जीएसटी इंटेलिजेंस निदेशालय की ओर से कहा गया कि “reason to believe” एक आंतरिक दस्तावेज है और उसे आरोपी को देना अनिवार्य नहीं है। विभाग ने यह भी कहा कि गिरफ्तारी और रिमांड कानून के अनुरूप हुए हैं।

विभाग के वकील ने यह भी दलील दी कि गिरफ्तारी के आधार 16 जनवरी को ही दे दिए गए थे और याची के हस्ताक्षर भी लिए गए थे।

अदालत की टिप्पणी

खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि यदि रिमांड आदेश विधि के अनुरूप नहीं है, तो गिरफ्तारी भी अवैध मानी जाएगी और ऐसे में हैबियस कॉर्पस याचिका सुनवाई योग्य है।

अदालत ने माना कि “reason to believe” दर्ज करना आयुक्त का कर्तव्य है, लेकिन उसे आरोपी को देना कानून में स्पष्ट रूप से अनिवार्य नहीं बताया गया है।

हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में देना और उसे गिरफ्तारी मेमो का हिस्सा बनाना जरूरी है।

पीठ ने पाया कि गिरफ्तारी मेमो में किसी संलग्नक का उल्लेख नहीं था। इस पर अदालत ने टिप्पणी की, “जब विभाग का अपना परिपत्र लिखित आधार देने की बात करता है, तो उसका पालन किया जाना चाहिए।”

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रिमांड आदेश पर सवाल

अदालत ने रिमांड आदेश का अवलोकन करते हुए पाया कि उसमें यह स्पष्ट उल्लेख नहीं है कि गिरफ्तारी के आधार याची को गिरफ्तारी के समय उपलब्ध कराए गए थे।

पीठ ने कहा कि रिकॉर्ड पर यह भी स्पष्ट नहीं है कि मजिस्ट्रेट ने ‘reason to believe’ की सामग्री का समुचित परीक्षण किया या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट के Satendra Kumar Antil फैसले का हवाला देते हुए अदालत ने माना कि सात वर्ष से कम सजा वाले मामलों में गिरफ्तारी को लेकर सावधानी बरती जानी चाहिए।

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अदालत का निर्णय

अंततः हाईकोर्ट ने माना कि रिमांड आदेश विधिक दृष्टि से त्रुटिपूर्ण है और उसे कायम नहीं रखा जा सकता।

अदालत ने रिमांड आदेश निरस्त करते हुए जय कुमार अग्रवाल की रिहाई का निर्देश दिया। साथ ही स्पष्ट किया कि विभाग चाहे तो कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई कर सकता है।

Case Title: Jai Kumar Aggarwal vs Directorate General of GST Intelligence & Others

Case No.: Habeas Corpus Writ Petition No. 139 of 2026

Decision Date: 13 February 2026

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