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इलाहाबाद हाईकोर्ट का कड़ा फैसला: मृत व्यक्ति के खिलाफ डिक्री 'शून्य', नगर निगम को नाम दर्ज करने का आदेश रद्द

Vivek G.
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नगर निगम गाजियाबाद और अन्य बनाम इंद्र मोहन सचदेव, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मृत व्यक्ति के खिलाफ पारित डिक्री को शून्य बताया, गाजियाबाद नगर निगम के पक्ष में फैसला।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का कड़ा फैसला: मृत व्यक्ति के खिलाफ डिक्री 'शून्य', नगर निगम को नाम दर्ज करने का आदेश रद्द

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि किसी मृत व्यक्ति के खिलाफ पारित की गई डिक्री कानून की नजर में शून्य (nullity) होती है। ऐसे आदेश के आधार पर कोई अधिकार पैदा नहीं होता। इसी आधार पर अदालत ने गाजियाबाद नगर निगम के खिलाफ पारित निचली अदालत का आदेश रद्द कर दिया।

यह फैसला जस्टिस संदीप जैन की एकल पीठ ने FIRST APPEAL No. 702 of 2025 में सुनाया।

मामला क्या था?

वादकारी इंद्र मोहन सचदेव ने दावा किया कि वह आनंद इंडस्ट्रियल एस्टेट, जीटी रोड, गाजियाबाद स्थित प्लॉट नंबर 9 के मालिक हैं। उन्होंने बताया कि 31 मई 2022 को एक सिविल कोर्ट ने उन्हें प्रतिकूल कब्जे (adverse possession) के आधार पर मालिक घोषित किया था।

इसके बाद उन्होंने नगर निगम से संपत्ति रजिस्टर में अपना नाम दर्ज करने की मांग की। निगम ने नाम दर्ज नहीं किया तो उन्होंने अनिवार्य निषेधाज्ञा (mandatory injunction) का मुकदमा दायर कर दिया।

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ट्रायल कोर्ट ने 13 मई 2025 को वादी के पक्ष में फैसला देते हुए नगर निगम को नाम दर्ज करने का आदेश दे दिया।

नगर निगम की आपत्ति

नगर निगम ने हाईकोर्ट में अपील करते हुए कहा कि 2022 में जो डिक्री पारित हुई, वह एक मृत महिला - सुषिला मेहरा - के खिलाफ दी गई थी, जिनकी मृत्यु 2 अप्रैल 1996 को हो चुकी थी।

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नगर निगम ने मृत्यु प्रमाण पत्र और अन्य दस्तावेज दाखिल किए, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने उन्हें फोटो कॉपी कहकर खारिज कर दिया।

अपील में निगम के वकील ने दलील दी, “मृत व्यक्ति के खिलाफ पारित डिक्री कानूनन शून्य होती है। ऐसे आदेश से कोई अधिकार उत्पन्न नहीं होता।”

हाईकोर्ट की टिप्पणी

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए पाया कि सुषिला मेहरा की मृत्यु 1996 में हो चुकी थी, जबकि उनके खिलाफ मुकदमा 2019 में दायर हुआ और 2022 में एकतरफा (ex parte) डिक्री पारित कर दी गई।

अदालत ने कहा:

“जब मुकदमा दायर होने से पहले ही प्रतिवादी की मृत्यु हो चुकी हो, तो उसके खिलाफ पारित डिक्री शून्य मानी जाएगी और उसका कोई कानूनी अस्तित्व नहीं है।”

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि ऐसी डिक्री को किसी भी चरण पर चुनौती दी जा सकती है।

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क्या सिर्फ टैक्स भरने से मालिकाना हक मिलता है?

वादी ने यह भी दलील दी थी कि वह नियमित रूप से हाउस टैक्स जमा कर रहे थे, इसलिए उन्हें मालिक माना जाए।

इस पर हाईकोर्ट ने साफ कहा:

“केवल नगर निगम में नाम दर्ज होना या हाउस टैक्स जमा करना, स्वामित्व का प्रमाण नहीं है।”

अदालत ने स्पष्ट किया कि राजस्व अभिलेख या म्युटेशन प्रविष्टियां केवल कर वसूली के लिए होती हैं, वे स्वामित्व स्थापित नहीं करतीं।

प्रतिकूल कब्जे का दावा क्यों नहीं माना गया?

हाईकोर्ट ने यह भी देखा कि वादी के पिता 1969 से किरायेदार के रूप में संपत्ति पर काबिज थे। अदालत ने कहा कि जो व्यक्ति किरायेदार के रूप में संपत्ति में प्रवेश करता है, वह बाद में उसी आधार पर प्रतिकूल कब्जे का दावा नहीं कर सकता।

पीठ ने कहा:

“किरायेदार अपने मकान मालिक के अधिकार को नकार कर प्रतिकूल कब्जे का दावा नहीं कर सकता।”

फैसले में हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि मृत्यु प्रमाण पत्र जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज को नजरअंदाज करना “चौंकाने वाला” है।

पीठ ने यहां तक कहा कि यह मामला न्यायिक कदाचार (judicial misconduct) का प्रतीत होता है और फाइल को प्रशासनिक कार्रवाई के लिए मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने का निर्देश दिया।

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अंतिम निर्णय

हाईकोर्ट ने नगर निगम की अपील स्वीकार करते हुए 13 मई 2025 का ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया।

वादी का मूल वाद (Original Suit No. 960 of 2024) लागत सहित खारिज कर दिया गया।

साथ ही, ट्रायल जज के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई पर विचार करने का निर्देश दिया गया।

Case Title: Nagar Nigam Ghaziabad & Another vs. Indra Mohan Sachdev

Case No.: FIRST APPEAL No. 702 of 2025

Decision Date: 24 February 2026

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