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आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट का अहम फैसला: कॉन्ट्रैक्ट शिक्षक को दूसरे अस्थायी से नहीं बदला जा सकता

Vivek G.
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डॉ. पी. नागराजू बनाम रायलसीमा विश्वविद्यालय और अन्य, आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि कॉन्ट्रैक्ट शिक्षक को दूसरे अस्थायी शिक्षक से नहीं बदला जा सकता, नियमित भर्ती जरूरी।

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट का अहम फैसला: कॉन्ट्रैक्ट शिक्षक को दूसरे अस्थायी से नहीं बदला जा सकता

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालयों में वर्षों से कार्यरत संविदा शिक्षकों के अधिकारों पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा कि किसी कॉन्ट्रैक्ट शिक्षक को हटाकर उसकी जगह दूसरा कॉन्ट्रैक्ट शिक्षक नियुक्त करना कानूनसम्मत नहीं है।

यह फैसला 31 जनवरी 2026 को न्यायमूर्ति महेश्वरा राव कुंचेम ने सुनाया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता डॉ. पी. नागराजू, जो रायलसीमा विश्वविद्यालय, कुरनूल में सहायक प्रोफेसर (मैनेजमेंट) के रूप में कार्यरत थे, वर्ष 2006 से संविदा आधार पर सेवा दे रहे थे।

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उन्होंने अदालत को बताया कि वे लगातार 11 वर्षों से पढ़ा रहे हैं। उनके खिलाफ कोई शिकायत या अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं हुई। बावजूद इसके, विश्वविद्यालय ने 18 मई 2017 को एक सर्कुलर जारी कर संविदा आधार पर ही नए असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्त करने की प्रक्रिया शुरू कर दी।

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि उन्हें हटाकर किसी अन्य कॉन्ट्रैक्ट शिक्षक को लाना मनमाना और असंवैधानिक कदम होगा।

विश्वविद्यालय का पक्ष

रायलसीमा विश्वविद्यालय ने अपने जवाब में कहा कि याचिकाकर्ता की नियुक्ति पूरी तरह अस्थायी थी। यह नियुक्ति नियमित चयन प्रक्रिया के तहत नहीं हुई थी।

विश्वविद्यालय ने यह भी तर्क दिया कि सरकार द्वारा नियमित पदों की स्वीकृति बाद में मिली और वर्तमान में कार्यभार कम होने के कारण संविदा शिक्षकों की आवश्यकता सीमित है।

हालांकि, सुनवाई के दौरान विश्वविद्यालय ने स्वीकार किया कि नियमित भर्ती की अधिसूचना पहले जारी हुई थी, लेकिन वह प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी।

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अदालत की मुख्य टिप्पणी

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि “एक अस्थायी कर्मचारी को दूसरे अस्थायी कर्मचारी से बदलना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के खिलाफ है।”

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अस्थायी नियुक्तियां केवल तब तक के लिए होती हैं, जब तक नियमित चयन प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती।

पीठ ने कहा,“कॉन्ट्रैक्ट नियुक्ति एक अस्थायी पुल की तरह है। इसे स्थायी व्यवस्था का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।”

कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि अगर काम निरंतर और स्थायी प्रकृति का है, तो संस्थान की जिम्मेदारी है कि वह नियमित भर्ती प्रक्रिया अपनाए।

शिक्षा और संवैधानिक दायित्व पर टिप्पणी

अदालत ने शिक्षा को केवल प्रशासनिक कार्य नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व बताया।

पीठ ने कहा, “शिक्षा बच्चों और युवाओं के भविष्य से जुड़ा मूल अधिकार है। बार-बार शिक्षकों को बदलना शैक्षणिक गुणवत्ता को प्रभावित करता है।”

न्यायालय ने यह भी कहा कि संविदा शिक्षक कोई “उपयोग करके छोड़ देने वाली व्यवस्था” नहीं हैं। वे भी संस्थान की निरंतरता और शैक्षणिक स्थिरता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

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अंतिम निर्णय

कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए निम्न निर्देश दिए:

1. याचिकाकर्ता को उनके पद पर तब तक कार्य जारी रखने दिया जाए, जब तक विधिसम्मत प्रक्रिया से नियमित नियुक्ति न हो जाए।

2. विश्वविद्यालय नियमित भर्ती के लिए नई अधिसूचना जारी करने के लिए स्वतंत्र है।

3. यदि कोई अनुशासनात्मक मामला हो, तो विश्वविद्यालय कानून के अनुसार कार्रवाई कर सकता है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविदा शिक्षक को केवल नियमित रूप से चयनित स्थायी उम्मीदवार से ही बदला जा सकता है, न कि किसी अन्य अस्थायी नियुक्ति से।

Case Title: Dr. P. Nagaraju v. Rayalaseema University & Others

Case No.: W.P. No. 21904 of 2017

Decision Date: 31 January 2026

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