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18 महीने की समय-सीमा के बाद भी मध्यस्थता बढ़ सकती है: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, हाईकोर्ट आदेश पलटा

Vivek G.
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सी. वेलुसामी बनाम के. इंधेरा, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मध्यस्थता अवॉर्ड के बाद भी Arbitrator की समय-सीमा बढ़ाई जा सकती है, Section 29A पर बड़ा फैसला।

18 महीने की समय-सीमा के बाद भी मध्यस्थता बढ़ सकती है: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, हाईकोर्ट आदेश पलटा

नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट की अदालत में सोमवार को एक अहम सवाल पर सुनवाई हुई-क्या मध्यस्थ (Arbitrator) की समय-सीमा खत्म होने के बाद दिया गया अवॉर्ड पूरी तरह अमान्य हो जाता है, या अदालत उसे बाद में भी वैध बना सकती है? सुप्रीम कोर्ट ने इस पर स्पष्ट शब्दों में जवाब दिया और मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला C. Velusamy बनाम K. Indhera से जुड़ा है। दोनों पक्षों के बीच जमीन से जुड़े तीन “एग्रीमेंट टू सेल” थे। विवाद बढ़ने पर हाईकोर्ट ने 2022 में एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त किया।

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कानून के अनुसार, मध्यस्थ को 12 महीने में फैसला देना था। पक्षकारों की सहमति से यह अवधि 6 महीने और बढ़ाई गई, यानी कुल 18 महीने। यह समय-सीमा 20 फरवरी 2024 को खत्म हो गई।

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हालांकि, मध्यस्थ ने अंतिम अवॉर्ड 11 मई 2024 को दिया-यानी तय समय के बाद।

हाईकोर्ट का रुख

मद्रास हाईकोर्ट ने माना कि समय-सीमा खत्म होने के बाद दिया गया अवॉर्ड “शून्य” है।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अवॉर्ड आने के बाद मध्यस्थ की समय-सीमा बढ़ाने की अर्जी (Section 29A) स्वीकार नहीं की जा सकती।

इसके आधार पर हाईकोर्ट ने:

• मध्यस्थ की अवधि बढ़ाने की अर्जी खारिज की

• और अवॉर्ड को रद्द कर दिया

सुप्रीम कोर्ट में सवाल

सुप्रीम कोर्ट के सामने सीधा सवाल था:

“क्या अदालत अवॉर्ड आने के बाद भी मध्यस्थ की समय-सीमा बढ़ा सकती है?”

यानी, अगर मध्यस्थ ने देरी से फैसला दे दिया, तो क्या अदालत का अधिकार खत्म हो जाता है?

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कोर्ट की अहम टिप्पणियां

जस्टिस पामिडिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने कानून के उद्देश्य पर जोर दिया।

पीठ ने कहा:

“मध्यस्थ की गलती अदालत के अधिकार को खत्म नहीं कर सकती। अदालत का काम विवाद का समाधान सुनिश्चित करना है, न कि उसे तकनीकी आधार पर खत्म करना।”

कोर्ट ने यह भी साफ किया कि:

• देरी से दिया गया अवॉर्ड अपने आप लागू नहीं हो सकता

• लेकिन अदालत चाहे तो बाद में मध्यस्थ की अवधि बढ़ा सकती है

• और तब वही अवॉर्ड प्रभावी हो सकता है

कानून की व्याख्या

कोर्ट ने कहा कि आर्बिट्रेशन एक्ट की धारा 29A का मकसद मध्यस्थता को खत्म करना नहीं, बल्कि उसे समय पर पूरा कराना है।

पीठ ने माना कि अगर हर देरी पर प्रक्रिया ही खत्म कर दी जाए, तो:

• पक्षकारों का समय और पैसा दोनों बर्बाद होगा

• और मध्यस्थता की पूरी व्यवस्था ही कमजोर हो जाएगी

कोर्ट ने दो टूक कहा:

“धारा 29A कहीं भी यह नहीं कहती कि अवॉर्ड के बाद समय बढ़ाने की अर्जी पर रोक है।”

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सुप्रीम कोर्ट का फैसला

अंत में सुप्रीम कोर्ट ने:

• मद्रास हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया

• मध्यस्थ की अवधि बढ़ाने की अर्जी फिर से बहाल की

• और हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि वह कानून के अनुसार दोबारा फैसला करे

कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि:

• अवॉर्ड अपने आप वैध नहीं होगा

• लेकिन अदालत के पास उसे वैध बनाने की पूरी शक्ति है

यहीं पर सुनवाई समाप्त हुई।

Case Title: C. Velusamy vs K. Indhera

Case No.: Civil Appeal arising out of SLP (C) No. 6551 of 2025

Decision Date: 03 February 2026

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