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भरण-पोषण सामाजिक सुरक्षा है, कमाई का बंटवारा नहीं: राजस्थान हाईकोर्ट ने बढ़ोतरी की मांग खारिज की

Shivam
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रितु खत्री बनाम नवनीत खन्ना - राजस्थान उच्च न्यायालय ने पत्नी के भरण-पोषण में वृद्धि करने से इनकार कर दिया, अल्पकालिक वैवाहिक विवाद में धारा 125 सीआरपीसी के तहत 8,000 रुपये प्रति माह के भरण-पोषण को बरकरार रखा।

भरण-पोषण सामाजिक सुरक्षा है, कमाई का बंटवारा नहीं: राजस्थान हाईकोर्ट ने बढ़ोतरी की मांग खारिज की

राजस्थान हाईकोर्ट, जोधपुर ने पत्नी द्वारा मांगी गई गुजारा भत्ते की बढ़ोतरी की मांग को खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश को सही ठहराया। अदालत ने साफ कहा कि गुजारा भत्ता सजा नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा का साधन है, और इसका उद्देश्य किसी एक पक्ष को अनुचित लाभ पहुंचाना नहीं हो सकता

मामले की पृष्ठभूमि

मामला श्रीगंगानगर की रहने वाली महिला से जुड़ा है, जिनकी शादी अक्टूबर 2019 में अहमदाबाद में हुई थी। पत्नी ने आरोप लगाया कि शादी के तुरंत बाद दहेज को लेकर प्रताड़ना शुरू हो गई, शारीरिक व मानसिक हिंसा हुई और उन्हें मायके छोड़ दिया गया। इसके बाद उन्होंने धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत भरण-पोषण की मांग की।

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फैमिली कोर्ट ने जुलाई 2024 में महिला को आवेदन की तारीख से ₹8,000 प्रति माह गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। महिला ने इस राशि को “बेहद कम” बताते हुए हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की।

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पत्नी की ओर से दलील दी गई कि वह फिलहाल बेरोज़गार हैं और पूरी तरह पिता पर निर्भर हैं। दूसरी ओर, पति एक सरकारी संस्थान में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं और उनकी आय काफी अधिक है। ऐसे में ₹8,000 की राशि सम्मानजनक जीवन के लिए नाकाफी है।

पति ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि पत्नी उच्च शिक्षित हैं, पहले भी अच्छे संस्थानों में काम कर चुकी हैं और कमाने में सक्षम हैं। उन्होंने यह भी कहा कि शादी केवल लगभग 57 दिन चली, जो गुजारा भत्ता तय करते समय एक अहम पहलू है। साथ ही, उन्होंने यह भी बताया कि वह एक नाबालिग बेटी के अकेले अभिभावक हैं और नियमित रूप से अदालत के आदेश का पालन कर रहे हैं।

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अदालत की टिप्पणियां

न्यायमूर्ति फरजंद अली ने कहा कि पुनरीक्षण का दायरा सीमित होता है और जब तक निचली अदालत का आदेश स्पष्ट रूप से गलत या मनमाना न हो, उसमें दखल नहीं दिया जा सकता।

अदालत ने टिप्पणी की,

“गुजारा भत्ता न तो दंड है और न ही संपत्ति में हिस्सेदारी का साधन। इसका उद्देश्य आश्रित जीवनसाथी को बेसहारा होने से बचाना है।”

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कोर्ट ने यह भी माना कि पत्नी की शैक्षणिक योग्यता और पूर्व कार्य अनुभव को पूरी तरह नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। साथ ही, यह तर्क भी स्वीकार नहीं किया गया कि पति की अधिक आय होने मात्र से पत्नी को उसी अनुपात में राशि मिलनी चाहिए।

अंतिम निर्णय

सभी पहलुओं पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने विवेकपूर्ण संतुलन के साथ निर्णय दिया है। 57 दिन की अल्प अवधि की शादी, पत्नी की योग्यता, पति की जिम्मेदारियां और पहले से दिए जा रहे भुगतान को देखते हुए ₹8,000 प्रति माह की राशि को न तो मनमाना और न ही अन्यायपूर्ण माना जा सकता।

अदालत ने याचिका खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा और गुजारा भत्ते में बढ़ोतरी से इनकार कर दिया।

Case Title: Ritu Khatri v. Navneet Khanna

Case Number: S.B. Criminal Revision Petition No. 1083/2024

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