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बिना गवाह और मौखिक सुनवाई के बर्खास्तगी नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने यूपी कोऑपरेटिव फेडरेशन का आदेश रद्द किया

Shivam
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिना गवाह और मौखिक सुनवाई के विभागीय कार्रवाई अवैध है, और यूपी कोऑपरेटिव फेडरेशन का बर्खास्तगी आदेश रद्द कर दिया। - जय प्रकाश सैनी बनाम प्रबंध निदेशक, उत्तर प्रदेश सहकारी संघ लिमिटेड और अन्य।

बिना गवाह और मौखिक सुनवाई के बर्खास्तगी नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने यूपी कोऑपरेटिव फेडरेशन का आदेश रद्द किया

नई दिल्ली में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि विभागीय जांच में नियमों और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन अनिवार्य है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब कर्मचारी आरोपों से इनकार करता है, तो बिना गवाहों की जांच और मौखिक सुनवाई के दी गई सजा टिक नहीं सकती।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला जय प्रकाश सैनी बनाम मैनेजिंग डायरेक्टर, यूपी कोऑपरेटिव फेडरेशन लिमिटेड से जुड़ा है। अपीलकर्ता, जो धान खरीद केंद्र के प्रभारी थे, पर आरोप था कि उन्होंने धान की आपूर्ति में कमी की और वित्तीय अनियमितता की।

विभागीय जांच में आरोप सिद्ध मानते हुए उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया और लगभग ₹9.5 लाख की वसूली का आदेश भी दिया गया। हाईकोर्ट ने इस आदेश को सही ठहराया था, जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई।

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सुनवाई के दौरान अदालत ने रिकॉर्ड का विस्तार से परीक्षण किया। यह सामने आया कि विभागीय जांच में किसी भी गवाह को पेश नहीं किया गया था।

बेंच ने साफ कहा कि:

“जब कर्मचारी आरोपों से इनकार करता है, तो विभाग का कर्तव्य है कि वह आरोपों को साबित करने के लिए साक्ष्य प्रस्तुत करे और गवाहों की जांच करे।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल दस्तावेजों के आधार पर, बिना उन्हें साबित किए, किसी कर्मचारी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

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बेंच ने कहा:

“विभागीय चार्जशीट कोई दीवानी वाद नहीं है कि अस्पष्ट जवाब को स्वीकारोक्ति माना जाए। जब तक स्पष्ट स्वीकारोक्ति न हो, आरोप सिद्ध करना विभाग की जिम्मेदारी है।”

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी दोहराया कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के तहत कर्मचारी को गवाहों से जिरह (cross-examination) का अवसर देना आवश्यक है।

अदालत ने पाया कि जांच प्रक्रिया में कई गंभीर खामियां थीं:

• कोई मौखिक सुनवाई प्रभावी तरीके से नहीं हुई

• कोई गवाह पेश नहीं किया गया

• आरोपों को साबित करने के लिए साक्ष्य का परीक्षण नहीं हुआ

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बेंच ने कहा कि ऐसी जांच “सिर्फ औपचारिकता” बनकर रह जाती है, जो कानूनन स्वीकार्य नहीं है।

इन सभी तथ्यों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया।

अदालत ने आदेश दिया कि:

• बर्खास्तगी और वसूली का आदेश निरस्त किया जाता है

• विभाग को छह महीने के भीतर नई (de novo) जांच करने की अनुमति दी जाती है

• यदि नई जांच नहीं होती, तो कर्मचारी को सेवा में बहाल किया जाएगा और उसे सभी सेवा लाभ मिलेंगे

Case Details

Case Title: Jai Prakash Saini vs Managing Director, U.P. Cooperative Federation Ltd. & Ors.

Case Number: Civil Appeal arising out of SLP (C) No. 2900/2020

Judge: Justice Manoj Misra (with Justice Sanjay Karol)

Decision Date: April 1, 2026

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