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BNSS की धारा 175(4) पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: पुलिसकर्मियों पर आरोपों में मजिस्ट्रेट की प्रक्रिया तय

Vivek G.
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XXX बनाम केरल राज्य और अन्य - सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि लोक सेवकों के खिलाफ एफआईआर में बीएनएसएस की धारा 175 के सुरक्षा उपायों का पालन कैसे किया जाना चाहिए, केरल उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द किया।

BNSS की धारा 175(4) पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: पुलिसकर्मियों पर आरोपों में मजिस्ट्रेट की प्रक्रिया तय

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की एक नई और अहम धारा-धारा 175(4)-की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है कि जब किसी सार्वजनिक सेवक, खासकर पुलिस अधिकारी, के खिलाफ शिकायत आती है, तो मजिस्ट्रेट को किस तरह की प्रक्रिया अपनानी चाहिए। यह फैसला केरल से जुड़े एक संवेदनशील मामले में आया, जिसमें पुलिस अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए गए थे।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता महिला ने आरोप लगाया कि एक संपत्ति विवाद से जुड़े मामले के दौरान अलग-अलग समय पर तीन पुलिस अधिकारियों ने उसके साथ यौन उत्पीड़न और बलात्कार किया। महिला ने पहले पुलिस अधिकारियों को शिकायत दी, लेकिन जांच के बाद पुलिस की ओर से आरोपों को असत्य बताया गया। काफी समय बीत जाने के बाद, उसने BNSS के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन देकर एफआईआर दर्ज करने की मांग की।

न्यायिक मजिस्ट्रेट ने BNSS की धारा 175(4) के तहत आरोपी पुलिस अधिकारी के वरिष्ठ से रिपोर्ट तलब की। इसी बीच महिला ने केरल हाईकोर्ट का रुख किया।

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हाईकोर्ट में क्या हुआ

केरल हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने माना कि बलात्कार जैसे अपराध को “सरकारी कर्तव्य के निर्वहन” का हिस्सा नहीं कहा जा सकता। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में धारा 175(4) का पालन अनिवार्य नहीं है और मजिस्ट्रेट को सीधे एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया।

हालांकि, इस आदेश के खिलाफ दायर अपील में हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने एकल न्यायाधीश का फैसला पलट दिया। डिवीजन बेंच ने कहा कि जब मजिस्ट्रेट के समक्ष मामला लंबित था, तब रिट याचिका में दखल देना उचित नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सवाल

सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य रूप से दो सवाल थे-

1. क्या BNSS की धारा 175(4) एक स्वतंत्र प्रावधान है या इसे धारा 175(3) के साथ पढ़ा जाना चाहिए?

2. जब किसी सार्वजनिक सेवक पर आरोप लगे हों, तो मजिस्ट्रेट को जांच का आदेश देने से पहले कौन-सी प्रक्रिया अपनानी चाहिए?

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कोर्ट की अहम टिप्पणियां

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने विस्तृत सुनवाई के बाद कहा कि धारा 175(4) को अलग-थलग करके नहीं पढ़ा जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया,

“धारा 175(4) कोई स्वतंत्र या अकेला प्रावधान नहीं है, बल्कि यह धारा 175(3) के साथ मिलकर लागू होती है।”

कोर्ट ने माना कि इस धारा का उद्देश्य सार्वजनिक सेवकों को मनगढ़ंत या बदले की भावना से की गई शिकायतों से बचाना है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें कानून से ऊपर रखा जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि सार्वजनिक सेवक के खिलाफ शिकायत लिखित होनी चाहिए और उसके साथ हलफनामा (एफिडेविट) अनिवार्य है। पीठ ने कहा कि बिना हलफनामे के जांच का आदेश देना “प्रक्रियात्मक सुरक्षा” को कमजोर करेगा। कोर्ट के शब्दों में,

“हलफनामा शिकायतकर्ता को जिम्मेदार बनाता है और झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर रोक लगाता है।”

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कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि हर मामला अपने तथ्यों पर निर्भर करेगा। यदि कोई कृत्य वास्तव में सरकारी कर्तव्य के निर्वहन से जुड़ा है, तभी धारा 175(4) की अतिरिक्त सुरक्षा लागू होगी। हालांकि, कोर्ट ने इस स्तर पर यह तय नहीं किया कि आरोपित पुलिस अधिकारियों के कथित कृत्य सरकारी कर्तव्य के दायरे में आते हैं या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले को सही ठहराया और कहा कि एकल न्यायाधीश ने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर आदेश दिया था। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन लंबित हो, तो आम तौर पर सीधे रिट याचिका में हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए।

इसी के साथ, अदालत ने BNSS की धारा 175(3) और 175(4) के बीच संतुलन स्थापित करते हुए यह तय कर दिया कि सार्वजनिक सेवकों के खिलाफ जांच के आदेश से पहले मजिस्ट्रेट को किन कानूनी औपचारिकताओं का पालन करना होगा।

Case Title: XXX v. State of Kerala & Ors.

Case Number: Criminal Appeal No. 4629 of 2025

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