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बॉम्बे हाई कोर्ट ने 'काला जादू' मामले में एफआईआर रद्द की, सफेद सरसों के आरोप के पीछे कोई सबूत या इरादा नहीं पाया।

Shivam
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि घर के बाहर सरसों छिड़कना काला जादू नहीं है और इस आधार पर दर्ज FIR व चार्जशीट को रद्द कर दिया। - गजानन काशीराम शेकोकर बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने 'काला जादू' मामले में एफआईआर रद्द की, सफेद सरसों के आरोप के पीछे कोई सबूत या इरादा नहीं पाया।

बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने एक अहम फैसले में कहा कि किसी के घर के बाहर सफेद सरसों छिड़कना अपने आप में “काला जादू” या आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता। अदालत ने इस आधार पर दर्ज FIR और चार्जशीट को रद्द कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला औरंगाबाद स्थित सीआईडीसीओ पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर संख्या 0343/2025 से संबंधित है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि तड़के उसके घर के बाहर सफेद सरसों के बीज बिखरे हुए पाए गए। पड़ोसी के सीसीटीवी फुटेज में कथित तौर पर एक मोटरसाइकिल गुजरती हुई दिखाई दी, जो शिकायतकर्ता के नाम पर पंजीकृत थी।

इसके आधार पर, औरंगाबाद के 65 वर्षीय निवासी आवेदक पर महाराष्ट्र मानव बलि और अन्य अमानवीय, दुष्ट और अघोरी प्रथाओं और काला जादू की रोकथाम और उन्मूलन अधिनियम, 2013 की धारा 3(2) के तहत मामला दर्ज किया गया था। बाद में एक आरोप पत्र दायर किया गया और मजिस्ट्रेट अदालत के समक्ष मुकदमे की कार्यवाही शुरू हो गई।

आवेदक ने एफआईआर और कार्यवाही को रद्द करने की मांग करते हुए उच्च न्यायालय का रुख किया।

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आरोपी की ओर से दलील दी गई कि:

• FIR में ऐसा कोई आरोप नहीं है जिससे यह साबित हो कि आरोपी ने किसी को डराने, ठगने या नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से काम किया।

• केवल सरसों छिड़कना कानून के तहत अपराध नहीं बनता।

• CCTV फुटेज में व्यक्ति की पहचान स्पष्ट नहीं है, सिर्फ वाहन नंबर के आधार पर आरोपी को जोड़ा गया।

अदालत ने रिकॉर्ड का विश्लेषण करते हुए पाया कि:

• CCTV फुटेज के मालिक का बयान चार्जशीट में शामिल नहीं किया गया।

• फुटेज में व्यक्ति हेलमेट पहने हुए था, जिससे पहचान स्थापित नहीं होती।

अदालत ने स्पष्ट कहा,

“यदि FIR के आरोपों को ज्यों का त्यों मान भी लिया जाए, तब भी केवल सफेद सरसों छिड़कना धारा 3(2) के तहत अपराध नहीं बनता।”

अदालत ने यह भी कहा कि इस कानून के तहत अपराध तभी बनता है जब कोई व्यक्ति काला जादू या अंधविश्वास के जरिए डर, धोखाधड़ी या नुकसान पहुंचाने की मंशा रखता हो।

अदालत ने यह भी नोट किया कि:

• शिकायतकर्ता और आरोपी के परिवार के बीच पहले से वैवाहिक विवाद चल रहा था।

• FIR उसी समय दर्ज की गई जब समझौते की प्रक्रिया चल रही थी।

इस पर अदालत ने कहा कि,

“ऐसी परिस्थितियों में यह संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि FIR निजी विवाद के चलते दर्ज की गई हो।”

सभी तथ्यों और कानून के विश्लेषण के बाद हाईकोर्ट ने अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए FIR और चार्जशीट को रद्द कर दिया। अदालत ने माना कि आरोप prima facie (पहली नजर में) किसी अपराध को स्थापित नहीं करते।

Case Details

Case Title: Gajanan Kashiram Shekokar vs State of Maharashtra & Anr.

Case Number: Criminal Application No. 3109 of 2025

Judge: Justice S. G. Chapalgaonkar

Decision Date: April 20, 2026

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