Logo

फाइनल बहस के बाद नए दस्तावेज़ स्वीकार नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द किया

Court Book
Add Court Book as a preferred source on Google

बॉम्बे हाई कोर्ट ने देर से चरण के विशेषज्ञ साक्ष्य की अनुमति देने वाले एक ट्रायल कोर्ट के आदेश को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि बिना कारण अंतिम चरण में स्वीकृति नहीं दी जा सकती। - विन्सेंट फिलिप डी'कोस्टा बनाम स्टेला लॉरेंस फ्रीटास

फाइनल बहस के बाद नए दस्तावेज़ स्वीकार नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द किया

गोवा पीठ वाले बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया कि मुकदमे के अंतिम चरण में बिना उचित कारण के नए दस्तावेज़ पेश करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालत ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें ग्राफोलॉजिस्ट (हस्तलेखन विशेषज्ञ) की रिपोर्ट को अंतिम बहस के समय रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति दी गई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद एक वसीयत (Will) को लेकर था। याचिकाकर्ता के खिलाफ उत्तरदाताओं (मूल वादियों) ने 2009 में सिविल सूट दायर किया था, जिसमें आरोप लगाया गया कि वसीयत दबाव और मानसिक अस्थिरता की स्थिति में बनाई गई थी।

वादियों का कहना था कि मृतका उस समय स्वस्थ मानसिक स्थिति में नहीं थीं, जबकि प्रतिवादी ने दावा किया कि वसीयत प्रेम और स्वेच्छा से बनाई गई थी।

Read also:- 7 साल की देरी और कमजोर सबूत: सुप्रीम कोर्ट ने दहेज केस में ससुराल पक्ष को दी राहत, FIR रद्द

Court Book subscription: bare acts, legal drafts, court judgments and ad-free legal news, plans from ₹30/month

लंबे समय तक साक्ष्य रिकॉर्ड होने के बाद, मामला अंतिम बहस के चरण में पहुंच गया। इसी दौरान वादियों ने ग्राफोलॉजिस्ट की रिपोर्ट पेश करने का आवेदन दिया।

ट्रायल कोर्ट ने 17 फरवरी 2024 को वादियों को अतिरिक्त दस्तावेज़ (ग्राफोलॉजिस्ट रिपोर्ट) पेश करने की अनुमति दे दी, हालांकि ₹1000 की लागत भी लगाई गई।

याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि:

• यह आवेदन बहुत देर से किया गया

• देरी का कोई उचित कारण नहीं बताया गया

• सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के नियमों का पालन नहीं हुआ

“यह केवल मुकदमे को लंबा करने का प्रयास है,” याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत में कहा।

न्यायमूर्ति वाल्मीकि मेनेजेस ने स्पष्ट किया कि:

“अंतिम बहस के चरण में दस्तावेज़ पेश करने के लिए ‘उचित कारण’ दिखाना अनिवार्य है।”

Read also:- POCSO मामले में शंकराचार्य को अग्रिम जमानत: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- आरोपों की जांच ज़रूरी, पर गिरफ्तारी से संरक्षण उचित

अदालत ने पाया कि:

• आवेदन में देरी का कोई ठोस कारण नहीं दिया गया

• आवश्यक तथ्यों (jurisdictional facts) का उल्लेख नहीं था

• ट्रायल कोर्ट ने बिना उचित जांच के अनुमति दे दी

अदालत ने यह भी कहा कि विशेषज्ञ की राय तभी स्वीकार्य होती है जब:

1. वह संबंधित क्षेत्र में विशेषज्ञता सिद्ध करे

2. उसकी राय न्यायालय की सहायता करे

अदालत ने ग्राफोलॉजी (हस्तलेखन से व्यक्तित्व का अध्ययन) पर भी गंभीर टिप्पणी की:

“ग्राफोलॉजी वैज्ञानिक रूप से स्थापित विधा नहीं है, बल्कि इसे एक प्रकार की छद्म-विज्ञान (pseudoscience) माना जाता है।”

अदालत ने कहा कि ऐसी रिपोर्ट:

• ठोस वैज्ञानिक आधार नहीं दिखाती

• केवल राय (opinion) है, निर्णायक साक्ष्य नहीं

Read also:- तीन बच्चों की मौत पर हाईकोर्ट सख्त: असुरक्षित हाइडल टैंक को माना लापरवाही, मुआवजे का आदेश

अदालत ने स्पष्ट किया:

• विशेषज्ञ साक्ष्य केवल सहायक होता है, अंतिम नहीं

• बिना पर्याप्त कारण के देर से दस्तावेज़ स्वीकार नहीं किए जा सकते

• अदालत को पहले यह जांचना चाहिए कि साक्ष्य प्रासंगिक और स्वीकार्य है या नहीं

बॉम्बे हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को अवैध ठहराते हुए रद्द कर दिया।

“यह आदेश अधिकार क्षेत्र के बिना पारित किया गया है और इसे टिकाया नहीं जा सकता,” अदालत ने कहा।

याचिका स्वीकार करते हुए, 17 फरवरी 2024 का आदेश रद्द कर दिया गया।

Case Details

Case Title: Vincent Philip D’Costa v. Stella Lawrence Freitas

Case Number: Writ Petition No. 185 of 2026

Judge: Justice Valmiki Menezes

Decision Date: 13 March 2026

Counsels:

• Petitioner: Ms. Ashwini Agni with team

• Respondents: Mr. Jatin Ramaiya with team

Take CourtBook Everywhere

Access your account on the go with our mobile app.

Get it on Google PlayDownload on the App Store
Join the Court Book WhatsApp channel for latest judgments, notifications, legal news and exam updates