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वैध फ्री पास वाले रेलवे कर्मचारी को यात्री माना, बॉम्बे हाईकोर्ट ने ₹3 लाख रुपये मुआवजा दिया

Shivam
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सीताबाई पंढरीनाथ टेमघरे बनाम भारत संघ - बॉम्बे उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि वैध मुफ्त पास पर रेल कर्मचारी एक वास्तविक यात्री है, और दुर्घटना में ट्रेन से गिरने के लिए ₹3 लाख का मुआवजा दिया।

वैध फ्री पास वाले रेलवे कर्मचारी को यात्री माना, बॉम्बे हाईकोर्ट ने ₹3 लाख रुपये मुआवजा दिया

बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि केवल यात्रा विवरण न भरे होने के आधार पर किसी रेलवे कर्मचारी को “बोनाफाइड पैसेंजर” (वैध यात्री) मानने से इनकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल के पुराने आदेश को रद्द करते हुए मृत कर्मचारी के परिजनों को मुआवजा देने का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला कल्याण निवासी सीताबाई पंढरीनाथ तेमघरे द्वारा दायर किया गया था। उनके पति, जो रेलवे कर्मचारी थे, एक एक्सप्रेस ट्रेन से यात्रा के दौरान खंडाला और मंकी हिल के बीच गिर गए थे, जिससे उनकी मौत हो गई।

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परिजनों ने रेलवे अधिनियम के तहत मुआवजे की मांग की थी। हालांकि, रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल ने 11 नवंबर 2011 को यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि मृतक “बोनाफाइड पैसेंजर” नहीं थे, क्योंकि उनके पास में यात्रा का विवरण भरा हुआ नहीं था।

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हाईकोर्ट के समक्ष एक ही सवाल था क्या केवल इस कारण से कि पास पर यात्रा की तारीख और विवरण नहीं भरे गए थे, मृतक को वैध यात्री नहीं माना जा सकता?

अदालत की अहम टिप्पणियां

न्यायमूर्ति जितेंद्र जैन ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि यह बात निर्विवाद है कि हादसा एक “दुर्घटनावश ट्रेन से गिरने” का मामला था। रेलवे ने भी इसे “अनटूवार्ड इन्सिडेंट” (अप्रत्याशित घटना) मानने पर आपत्ति नहीं की थी।

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अदालत ने कहा कि रेलवे कर्मचारी रेलवे सर्वेंट्स (पास) नियम, 1986 के तहत निःशुल्क पास का हकदार होता है। इस मामले में यह भी स्वीकार किया गया कि मृतक के पास वैध सेकेंड क्लास फ्री पास था और घटना उसी अवधि में हुई, जब पास वैध था।

कोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा,

“सिर्फ इस आधार पर कि पास पर यात्रा का विवरण स्वयं नहीं भरा गया, यह मान लेना कि कर्मचारी वैध पास के बिना यात्रा कर रहा था, उचित नहीं है।”

अदालत ने यह भी कहा कि यदि कर्मचारी आरक्षित डिब्बे में यात्रा नहीं कर रहा था, तो पास पर किसी तरह का एंडोर्समेंट न होना अपने आप में घातक नहीं है।

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हालांकि हाईकोर्ट ने मृतक को “बोनाफाइड पैसेंजर” माना, लेकिन यह भी कहा कि पास के उपयोग को लेकर कुछ संदेह बना रहा, क्योंकि आवश्यक विवरण भरे नहीं गए थे। इसी आधार पर अदालत ने पूर्ण मुआवजे के बजाय आंशिक मुआवजा देना उचित समझा। कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में मुआवजा घटाया जा सकता है।

अंतिम फैसला

हाईकोर्ट ने रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल का आदेश रद्द कर दिया और अपील स्वीकार कर ली। अदालत ने निर्देश दिया कि मृतक के परिजनों को ₹3 लाख का मुआवजा दिया जाए, साथ ही दुर्घटना की तारीख से भुगतान तक 6% वार्षिक ब्याज भी दिया जाए, जिसकी अधिकतम सीमा ₹8 लाख होगी।

साथ ही, रेलवे को आठ सप्ताह के भीतर सभी आश्रितों के खातों में राशि समान रूप से ट्रांसफर करने का आदेश दिया गया।

Case Title: Seetabai Pandharinath Temghare v. Union of India

Case Number: First Appeal No. 315 of 2012

Date of Judgment: 19 January 2026

Advocates:

• For Appellant: Mr. Sainand Chaugule

• For Respondent: Mr. T. J. Pandian with Mr. Gautam Modanwal

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