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बॉम्बे हाईकोर्ट का अहम फैसला: POSH जांच में यौन उत्पीड़न न मिलने पर ‘रिप्रिमांड’ सज़ा रद्द

Shivam
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डॉ. मोहिंदर कुमार बनाम अध्यक्ष, नाबार्ड और अन्य - बॉम्बे उच्च न्यायालय ने नाबार्ड की फटकार को रद्द करते हुए फैसला सुनाया कि यौन उत्पीड़न न पाए जाने के बाद पीओएसएच समिति कार्रवाई की सिफारिश नहीं कर सकती।

बॉम्बे हाईकोर्ट का अहम फैसला: POSH जांच में यौन उत्पीड़न न मिलने पर ‘रिप्रिमांड’ सज़ा रद्द

बॉम्बे हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (NABARD) के सेवानिवृत्त अधिकारी डॉ. मोहिंदर कुमार को बड़ी राहत देते हुए केंद्रीय शिकायत समिति (CCC) की सिफारिश और उस आधार पर दी गई ‘रिप्रिमांड’ (फटकार) की सज़ा को रद्द कर दिया है। अदालत ने साफ कहा कि जब समिति ने खुद यह माना कि मामला यौन उत्पीड़न का नहीं है, तो उसके बाद अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश करने का उसे अधिकार नहीं था।

मामले की पृष्ठभूमि

डॉ. मोहिंदर कुमार NABARD में सहायक महाप्रबंधक के पद पर कार्यरत थे। वर्ष 2016 के दौरान उन्होंने अपने विभाग में कुछ महिला कर्मचारियों द्वारा कार्यालय समय में शोर-शराबे और बातचीत से कामकाज प्रभावित होने की शिकायत की थी। जब इन शिकायतों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो उन्होंने नवंबर 2019 में कुछ वीडियो रिकॉर्ड कर वरिष्ठ अधिकारियों को भेजे।

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इसके बाद संबंधित महिला कर्मचारियों ने उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई कि बिना अनुमति वीडियो रिकॉर्ड करना उन्हें असहज करता है। यह शिकायत POSH अधिनियम, 2013 के तहत गठित केंद्रीय शिकायत समिति (CCC) को भेजी गई।

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CCC ने जांच के बाद अपनी रिपोर्ट में माना कि वीडियो रिकॉर्ड करना यौन उत्पीड़न की परिभाषा में नहीं आता। समिति ने यह भी दर्ज किया कि वीडियो का कोई दुरुपयोग नहीं हुआ और न ही कोई यौन उद्देश्य सामने आया। हालांकि, इसके बावजूद समिति ने यह कहते हुए NABARD प्रबंधन को कार्रवाई की सिफारिश कर दी कि बिना अनुमति वीडियो रिकॉर्ड करना अनुचित है और इससे कार्यालय का माहौल बिगड़ा।

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इसी सिफारिश के आधार पर सक्षम प्राधिकारी ने डॉ. कुमार को ‘रिप्रिमांड’ की सज़ा दे दी।

अदालत की अहम टिप्पणियां

न्यायमूर्ति भारती डांगरे और न्यायमूर्ति मंजुषा देशपांडे की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा,

“जब समिति खुद यह निष्कर्ष निकाल चुकी है कि यौन उत्पीड़न का कोई मामला नहीं बनता, तो उसके बाद अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश करना कानून के खिलाफ है।”

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अदालत ने POSH अधिनियम की धारा 13(2) का हवाला देते हुए कहा कि यदि आरोप साबित नहीं होते, तो समिति को यह सिफारिश करनी होती है कि किसी भी तरह की कार्रवाई की आवश्यकता नहीं है।

कोर्ट का फैसला

हाईकोर्ट ने माना कि CCC ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर सिफारिश की और सक्षम प्राधिकारी ने बिना स्वतंत्र विचार किए उसी के आधार पर सज़ा दे दी। इसलिए अदालत ने 30 जून 2020 की CCC रिपोर्ट की सिफारिश और 24 सितंबर 2020 को दी गई ‘रिप्रिमांड’ की सज़ा - दोनों को रद्द कर दिया।

याचिका स्वीकार करते हुए अदालत ने कहा कि मामला यहीं समाप्त होता है।

Case Title: Dr. Mohinder Kumar v. The Chairman, NABARD & Anr.

Case Number: Writ Petition No. 1635 of 2021

Date of Judgment: 12 January 2026

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