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बॉम्बे हाई कोर्ट ने POCSO मामले में दोषसिद्धि बरकरार रखी, 10 साल की सजा के खिलाफ अपील खारिज

Vivek G.
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प्रदीप प्रकाश बैकर बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य। बॉम्बे हाई कोर्ट ने POCSO मामले में 10 साल की सजा बरकरार रखी, कहा पीड़िता की गवाही और मेडिकल साक्ष्य विश्वसनीय।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने POCSO मामले में दोषसिद्धि बरकरार रखी, 10 साल की सजा के खिलाफ अपील खारिज

मुंबई स्थित बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति की अपील खारिज कर दी है। अदालत ने साफ कहा कि पीड़िता की गवाही भरोसेमंद है और उसे मेडिकल साक्ष्य का भी समर्थन मिला है। ऐसे में ट्रायल कोर्ट के फैसले में दखल देने का कोई कारण नहीं बनता।

न्यायमूर्ति आर.एम. जोशी की एकल पीठ ने 25 फरवरी 2026 को यह फैसला सुनाया।

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मामले की पृष्ठभूमि

यह अपील विशेष न्यायालय द्वारा 7 जून 2022 को दिए गए फैसले के खिलाफ दायर की गई थी। आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(i) और 506 तथा पॉक्सो अधिनियम की धारा 6 और 10 के तहत दोषी ठहराया गया था। उसे 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी।

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मामले के अनुसार, पीड़िता की मां ने घाटकोपर पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। शिकायत में बताया गया कि घटना रिपोर्ट दर्ज होने से चार दिन पहले हुई थी। पीड़िता ने अपनी मां को बताया कि सामने रहने वाले व्यक्ति ने खाने का सामान देने के बहाने घर बुलाया और उसके साथ जबरन यौन संबंध बनाए।

जांच के दौरान पीड़िता का मेडिकल परीक्षण कराया गया। गवाहों के बयान दर्ज किए गए और अन्य दस्तावेजी साक्ष्य कोर्ट के सामने रखे गए। ट्रायल कोर्ट ने इन साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को दोषी करार दिया था।

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अपील में आरोपी की दलील

आरोपी की ओर से वकील ने दलील दी कि पीड़िता घटना की सही तारीख और समय नहीं बता सकी। उन्होंने कहा कि उसकी गवाही में विरोधाभास हैं और मेडिकल रिपोर्ट में कोई बाहरी या अंदरूनी चोट नहीं मिली।

वकील ने यह भी कहा कि मेडिकल अधिकारी ने स्पष्ट रूप से यह नहीं कहा कि यौन शोषण हुआ है। उनके अनुसार, स्वतंत्र गवाह का बयान भी अभियोजन के पक्ष को पूरी तरह मजबूत नहीं करता। इस आधार पर आरोपी को बरी करने की मांग की गई।

अदालत की टिप्पणियाँ

हाई कोर्ट ने कहा कि जब मामला किसी बच्चे के साथ यौन अपराध का हो, तो अदालत को पीड़िता की उम्र और मानसिक स्थिति को ध्यान में रखकर गवाही का मूल्यांकन करना चाहिए।

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पीठ ने कहा, “सिर्फ इसलिए कि पीड़िता सटीक तारीख नहीं बता पाई, उसकी पूरी गवाही को नकारा नहीं जा सकता।”

अदालत ने माना कि पीड़िता ने घटना का तरीका विस्तार से बताया और जिरह के दौरान उसकी बातों में कोई गंभीर विरोधाभास सामने नहीं आया।

एक पड़ोसी गवाह ने भी यह पुष्टि की कि उसने घटना के दिन पीड़िता को आरोपी के साथ जाते देखा था। अदालत ने कहा कि यह गवाही पीड़िता के बयान को समर्थन देती है।

मेडिकल रिपोर्ट में भले ही चोट का स्पष्ट उल्लेख नहीं था, लेकिन निजी अंग में लालिमा (redness) पाई गई थी। अदालत ने कहा कि इस लालिमा का कोई अन्य संतोषजनक कारण सामने नहीं आया।

पीठ ने कहा, “मेडिकल अधिकारी की राय केवल एक मत होती है। यदि अन्य साक्ष्य मजबूत हों, तो केवल राय के अभाव में अभियोजन का मामला कमजोर नहीं होता।”

अदालत ने पॉक्सो अधिनियम की धारा 29 का भी उल्लेख किया, जिसके तहत यदि अभियोजन मूल तथ्यों को साबित कर देता है, तो आरोपी पर यह जिम्मेदारी आती है कि वह खुद को निर्दोष साबित करे।

पीठ ने कहा कि इस मामले में आरोपी ऐसा कोई साक्ष्य पेश नहीं कर सका, जिससे झूठा फंसाए जाने की बात साबित हो सके।

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सजा पर विचार

फैसले के अंत में आरोपी के वकील ने दलील दी कि उसे पहले ही काफी समय जेल में बिताना पड़ा है, इसलिए सजा कम की जाए।

लेकिन राज्य की ओर से कहा गया कि कानून के तहत इस अपराध में न्यूनतम 10 वर्ष की सजा तय है। ऐसे में सजा कम करने की गुंजाइश नहीं है।

अदालत ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि सजा कानून के अनुसार है और उसमें कोई बदलाव नहीं किया जा सकता।

फैसला

हाई कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अपील में कोई दम नहीं है।

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“अभियोजन ने मूल तथ्यों को साबित किया है और आरोपी धारा 29 के तहत बनी धारणा को खंडित नहीं कर सका,” पीठ ने कहा।

इसी के साथ आपराधिक अपील खारिज कर दी गई और दोषसिद्धि व 10 वर्ष की सजा को बरकरार रखा गया।

Case Title: Pradip Prakash Baikar vs State of Maharashtra & Anr.

Case No.: Criminal Appeal No. 728 of 2022

Decision Date: 25 February 2026

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